नवभारत विशेष: मोदी-शाह के समान नौकरशाह भी बचाएं तेल, क्या भारत में खत्म होगा अब लग्जरी कारों का दौर?
India Oil Crisis: देश में बढ़ते तेल संकट और आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए प्रधानमंत्री की अपील के बाद, लग्जरी कारों पर लगाम और सार्वजनिक परिवहन में बड़े बदलावों की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
- Written By: आकाश मसने
अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (डिजाइन फोटो)
PM Modi Appeal For Oil Conservation: प्रधानमंत्री की आम लोगों से तेल बचाने के लिए की गई अपील राष्ट्रीय हित में स्वागत योग्य है। देश में चुनावी रैलियों और रोड शो जैसे राजनीतिक प्रदर्शनों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा देना चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अध्ययन किया जाना चाहिए कि कार काफिलों को सुरक्षा प्रभावित किए बिना कम किया जा सकता है या नहीं। केंद्र और राज्य तथा उनके विभिन्न उपक्रमों द्वारा सरकारी कार खरीद कार्यक्रम को किफायती श्रेणी तक सीमित कर देना चाहिए। केवल राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और भारत आने वाले विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के लिए ही लग्जरी कारों के उपयोग की सुविधा होनी चाहिए। सेना के जवानों के लिए कैंटीन स्टोर डिपार्टमेंट्स से कुछ दिनों के लिए जीएसटी सब्सिडी देकर कारें नहीं बेची जानी चाहिए।
अब समय आ गया है कि एयरकंडीशनिंग सुविधा वाले उन्नत ऑटोरिक्शा बाजार में लाए जाएं, ताकि कम से कम मध्यमवर्ग ऐसे वातानुकूलित ऑटोरिक्शा का उपयोग पसंद करें। इससे सड़क और पार्किंग की समस्या कम होगी तथा ये पर्यावरण अनुकूल भी होंगे। क्योंकि अब ऑटोरिक्शा या तो बैटरी से चलते हैं या सीएनजी इंजन वाले होते हैं।
दिल्ली में पार्किंग शुरू हुआ दोगुना
दिल्ली में पहले ही कारों की उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए कार पार्किंग शुल्क दोगुना किया जा चुका है। महंगी कारों पर जीएसटी बढ़ाकर 40 प्रतिशत किया जाना, एक सही निर्णय था। अधिक से अधिक शहरों में मेट्रो नेटवर्क बिछाना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए। कार निर्माता मेट्रो कोच निर्माण की ओर भी जा सकते हैं। वे अपनी उत्पादन क्षमता का उपयोग तीन पहिया वातानुकूलित ऑटोरिक्शा बनाने में भी कर सकते हैं। सभी करों के सहित 10 लाख रुपए से अधिक एक्स शो रूम कीमत वाली कारों के निर्माण को हतोत्साहित करने हेतु कदम उठाए जाने चाहिए। महंगी कारों पर रोड़ टैक्स, बीमा प्रीमियम और अन्य सभी शुल्क सस्ती कारों की तुलना में दोगुने होने चाहिए। कारों का वर्गीकरण, उनकी लंबाई और इंजन क्षमता के बजाय एक्स शो रूम कीमत के आधार पर होना चाहिए।
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कारों को कबाड़ घोषित करने नीति में बदलाव जरूरी
दिल्ली जैसे शहर में 10 वर्ष पुरानी डीजल कारों और 15 वर्ष पुरानी पेट्रोल कारों को अनिवार्य रूप से कबाड़ घोषित करने की कार स्क्रैपिंग नीति, वास्तव में कार उद्योग को बढ़ावा देने का अप्रत्यक्ष तरीका है, इसलिए इस पर रोक लगनी चाहिए। हर वाहन के लिए अनिवार्य होना चाहिए कि वह 10 वर्ष बाद अधिकृत वर्कशॉप जाकर कंप्यूटरीकृत फिटनेस परीक्षण में शामिल किया जाए और योग्य पाए जाने पर ही उसे अगले समय के लिए लाइसेंस दिया जाए, जो कारें परीक्षण पास करने में असफल रहें, उन्हें स्क्रैप करने का आदेश दिया जाना चाहिए। 10 वर्ष बाद कारों के लिए अलग रंग की नंबर प्लेट शुरू की जानी चाहिए।
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किसी कार मॉडल के बहुत अधिक वेरिएंट ग्राहकों को भ्रमित करते हैं अतः केवल दो वेरिएंट होने चाहिए। एक किफायती ग्राहकों के लिए बेसिक एलएक्स और दूसरा सभी अतिरिक्त सुविधाओं से युक्त वीएक्स के साथ, तीसरा ऑटोमेटिड गियर वाला मॉडल भी होना चाहिए। केंद्र सरकार को बैटरी जैसी सामान्य एक्सेसरीज के मानकीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि विभिन्न कंपनियों की अलग-अलग कारों में समान पुर्जी का उपयोग हो सके।
सरकारी कार खरीदी भी सीमित हो
भारत अपनी कुल जरूरत का 70 फीसदी से ज्यादा तेल आयात करता है और जिस तरह से लगातार तनाव की स्थितियां बनी हुई हैं, उसके कारण पिछले 2 महीनों में तेल की कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ गई हैं। इस कारण भारतीय तेल कंपनियों को हर दिन लगभग 2400 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आह्वान इन्हीं समस्याओं को लेकर था। उन्होंने अपने कारों के काफिले में महत्वपूर्ण कमी कर दी है। वह सिर्फ 2 कारों के साथ राजधानी दिल्ली में निकले थे। इसी का का अनुसरण अनुसरण गृहमंत्री गृहमं अमित शाह को भी करते देखा गया है। इसलिए अब बड़ी जिम्मेदारी बाकी मंत्रियों, नौकरशाहों और देश के एलीट वर्ग की है। है कि वो भी इस कदम का अनुसरण करें।
लेख- सुभाषचंद्र अग्रवाल के द्वारा
