Navabharat Nishanebaaz: जहां दिखे फायदा, उस ओर चल इसीलिए होता है इतना दलबदल
Party Switching Politics: राजनीति में दल बदल को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए नेताओं की बदलती निष्ठाओं और सत्ता के समीकरणों के साथ बदलते ‘आत्मज्ञान’ पर सवाल उठाए गए हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
India Political Defection Debate: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, कहते हैं कि जमाने की ठोकरें खाने के बाद इंसान को अक्ल आती है। अपने देश के सांसदों-विधायकों को दिव्य ज्ञान कब और कैसे प्राप्त होता है? कथ उनकी आंखें खुलती हैं? क्या वे किसी सत्संग में जाते हैं?’
हमने कहा, ‘जब उन्हें अपनी पार्टी का नेतृत्व पसंद नहीं आता और दूर के डोल सुहावने लगने लगते हैं, तब उन्हें अचानक आत्मज्ञान होता है कि वह अब तक गलत जगह पर थे। उन्हें नई मंजिल और नई राहें दिखने लगती हैं। बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार होने पर इस पार्टी के 20 सांसदों को ममता बनर्जी का नेतृत्व कमजोर तथा अभिषेक बनर्जी का व्यवहार तानाशाहीपूर्ण नजर आने लगा। शिवसेना (उबाठा) के सांसदों को एकनाथ शिंद की शिवसेना प्यारी लगने पर उन्हें दिव्य अनुभूति हुई कि उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से अक्षम और निष्क्रय हैं।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, इसी तरह आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सदस्यों को अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व भ्रष्ट लगने लगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव फरवरी 2027 में हो सकता है। वहां भी सपा के 37 सांसदों में से अनेक को अखिलेश यादव में दोष नजर आने लगे। दलबदल करने वाले नेताओं को अपनी पुरानी पार्टी करेले के समान कड़वी लगने लगती है। वह मन ही मन भगवे का चिंतन करते हुए भाजपा का भजन गाने लगते हैं। उन्हें लगता है कि जब ऋतुएं बदलती हैं, मौसम बदलता है, इंसान रोज कपड़े बदलता है, तो निष्ठा और दल बदलने में कौन-सा हर्ज है। एक ही ठिकाने पर रहने से इंसान की पूछ-परख और इज्जत नहीं रह जाती। वह घर की मुर्गी दाल बराबर बन जाता है। ऐसे में सांसदों-विधायकों का दिल होता है कहीं और चल। उनके मन में नमो नमो की मंगलमय ध्वनि गूंजने लगती है। उनकी अगली चाह और राह का मार्गदर्शन शाह करते हैं।’
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हमने कहा, ‘अपना राजनीतिक भविष्य जहां उज्ज्वल दिखाई दे, वहां तुरंत चले जाना चाहिए लुढ़कने वाले पत्थर को काई नहीं लगती। बहता हुआ पानी हमेशा स्वच्छ रहता है। राजनीति जनसेवा का मुखौटा लगाकर अपने स्वार्थ या मतलबपरस्ती के लिए की जाती है। खट्टे अंगूर तो लोमड़ी भी नहीं खाती!’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
