One Nation One Election India Proposal ( सोर्स: सोशल मीडिया )
One Nation One Election India Proposal: भारत के ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (ओएन ओई) प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने से खर्च कम होगा, लंबे समय तक सुरक्षा बल तैनात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, आचार संहिता की वजह से होने वाली दिक्कतें कम होंगी और राजनीतिक पार्टियों को लगातार चुनावी अभियान मोड में रहने से रोका जा सकेगा।
भारत में इस बारे में सबसे बड़ा ब्लूप्रिंट पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी उच्च स्तरीय समिति में सामने आया, जो अब संविधान (139वां संशोधन) बिल 2024 में कानूनी रूप ले रहा है। प्रस्तावित आर्टिकल 82ए राष्ट्रपति को एक ‘तय तारीख’ बताने का अधिकार देता है, जिससे सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के चक्र के साथ जुड़ जाएगा।
इस तारीख के बाद बनी विधानसभाओं का कार्यकाल कम कर दिया जाएगा। भले ही उनका पांच साल का कार्यकाल खत्म न हुआ हो। इसके अलावा यह भारतीय चुनाव आयोग को यह अधिकार देता है कि अगर एक साथ चुनाव कराना मुमकिन नहीं होता है, तो वह राज्य चुनावों को टालने की सिफारिश कर सकता है।
आर्टिकल 83, 172, और 327 में बदलाव का प्रस्ताव है, जो गंभीर संवैधानिक चिंताएं पैदा करते हैं। कॉन्स्टट्यूएंट असेंबली में डॉ. बीआर अंबेडकर ने समझाया कि भारत ने जिम्मेदारी चुनी। राज्य सिर्फ प्रशासनिक ईकाई नहीं, बल्कि उनकी एक स्वतंत्र संवैधानिक पहचान है।
इसके उलट संसद, राज्य विधानसभा और स्थानीय निकाय के लिए अलग-अलग चुनाव एक लगातार फीडबैक मैकेनिज्म बनाते हैं, जिससे सरकारें आमजन की संवेदनाओं पर ध्यान देती हैं।
संसदीय स्थायी समिति के अनुमानों से पता चलता है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव का कुल खर्च लगभग 4,500 करोड़ (2015-16), जो केंद्रीय बजट का लगभग 0.25% और जीडीपी का 0.03% है।
पीआरएस डेटा से पता चलता है कि लोकसभा चुनाव का खर्च पहले जीडीपी का 0.02%-0.05% (1957-2014) था। चुनाव चरणों में होते हैं मसलन 2024 में 82 दिन, जिससे चुनाव आयोग को ईवीएम, वीवीपैट और सिक्योरिटी फोर्स को रोटेट करने की इजाजत मिलती है।
एक साथ चुनाव कराने से यह लचीलापन खत्म हो जाएगा और महंगे नए संसाधनों की जरूरत होगी, जिससे प्रशासनिक फायदे कमजोर पड़ जाएंगे। क्या जीडीपी का 1% बचाने के लिए संविधान में बदलाव करना और संघीय व्यवस्था को कमजोर करना समझदारी है? चुनाव कोई अतिरिक्त खर्च नहीं है।
जिसे कम किया जा सके। इसके बजाय यह सेल्फ गवर्नमेंट की बार-बार होने वाली कोमत है, जिससे यह पक्का होता है कि सत्ता लोगों के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
सबसे परेशान करने वाली बात पूरे नहीं हुए विधायी कार्यकाल के लिए मध्यावधि चुनाव है। संविधान किसी बचे हुए कॉन्सेप्ट को मान्यता नहीं देता है। हालांकि प्रस्तावित आर्टिकल 83 (6) और 172(5) का दावा है कि नया चुना हुआ हाउस पिछले हाउस का विस्तारीकरण नहीं होगा, लेकिन वे तारतम्यता बनाए रखने के लिए पहले के चुनावी चक्र को असरदार तरीके से बनाए रखते हैं।
यह भी पढ़ें:-नवभारत निशानेबाज: बिग बी ने अयोध्या में भूखंड खरीद डाला, बने छोरा सरयू किनारे वाला
इससे कई गड़बड़ियां पैदा होती हैं। सबसे पहले, यह फ्रैंचाइज की वैल्यू कम करता है। मध्यावधि चुनाव से कम बहुमत वाली सरकारें बनेंगी, जिससे चुनाव सिर्फ कवायद बन जाएंगे और वोटर की और ज्यादा बेपरवाही का खतरा होगा।
दूसरा, यह शासन और जवाबदेही को कमजोर करता है, क्योंकि बचे हुए कार्यकाल की सरकारों में स्ट्रक्चरल रिफॉर्म के लिए इंसेंटिव की कमी होती है, जिससे पॉपुलिज्म और पॉलिसी ड्रिफ्ट को बढ़ावा मिलता है।
लेख- एम के स्टालिन. मुख्यमंत्री तमिलनाडु के द्वारा