निजी कंपनियों के बीच चांद पर चौधराहट जमाने की होड़ (सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: चांद पर उतरने वाले निजी मून लैंडर की संख्या बढ़ती जा रही है. अंतरिक्ष के क्षेत्र में विशेषतः चंद्र अभियानों में निजी क्षेत्र का यह दखल भविष्य में चांद के व्यावसायीकरण तथा अंतरिक्ष दोहन के क्षेत्र में क्या अर्थ रखता है, भारत के लिये इसके क्या मायने हैं? चांद की सतह पर प्राइवेट कंपनी के पहले मून लैंडर ‘ब्लू घोस्ट’ के उतरने के बाद, वहां अब दूसरा लैंडर भी उतर चुका है और कई उतरने की कतार में हैं। कुछ प्रक्षेपित होने वाले हैं, कुछ सफर में हैं तो कई प्रक्षेपणों की योजनाएं तैयार हैं, दुनिया के तमाम देश चांद पर अपनी-अपनी चौधराहट की इतनी चाहत क्यों रखते हैं? बेशक, चांद पर उतरना, उस पर दावा ठोंकना भविष्य में भारी फायदे का सौदा होगा।
सरकारें चाहे वे महाशक्तियों की हों अथवा विकसित या विकासशील देशों की, सभी ने पाया है कि अंतरिक्ष मिशनों में निजी कंपनियों को शामिल करना सुभीते से भरा है, यह समझौता जन, धन और समय बचाता है. साथ ही कुशलता, दक्षता, समयबद्धता बढ़ाता है।
प्राइवेट स्पेस एजेंसियां किस लाभ के लिये इतना कठिन कार्य कर रही हैं? क्या महज इसलिये कि उन्हें सरकार द्वारा दिये गए शोध, विकास, तकनीक और निर्माण संबंधी कार्यों से बेहतर पैसा मिलता है? इस काम में सफलता और कुशलता उनको वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में स्थापित कराएगी और वे उपग्रह प्रक्षेपण, अंतरिक्ष पर्यटन, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक कार्गो परिवहन जैसी सेवाएँ प्रदान कर महत्वपूर्ण राजस्व कमाएंगी ? निजी इक्विटी निवेश आकर्षित कर पाएंगी ? वे अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए ऐसी तकनीक विकसित कर पेटेंट ले सकती हैं, जिसका पृथ्वी पर भी उपयोग हो सकता है।
आज भी हम तमाम ऐसी तकनीक तथा वस्तुओं का जीवन में इस्तेमाल करते हैं जिनका आविष्कार वस्तुतः अंतरिक्ष क्षेत्र के लिये किया गया था. विदेशी स्पेस कंपनियां जिस तरह चांद पर अपने रोवर भेज कर शोध करने, जानकारी जुटाने के लिये होड़ में लगी हुई हैं, उससे संकेत मिलता है कि भविष्य में वे भी इस व्यवसाय, बाजार का दावेदार बनना चाहेंगी. क्योंकि चांद पर किसी देश का हक नहीं है. चांद हमारे सौर मंडल का प्रवेश द्वार है. यहां पहुंच जाएं तो हम अंतरग्रहीय अभियान आसानी से चला सकेंगे।
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चंद्रमा पर उतरने वाले लैंडर पता लगायेंगे कि क्या वे पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले जीपीएस उपग्रहों से संकेतों को ग्रहण करके उनका इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे धरती और चंद्रमा के बीच संचार की कड़ी बन जायेगी. वे चंद्रमा के अंदरूनी भाग का राज उजागर कर पता लगायेंगे कि चंद्रमा से गर्मी कैसे निकलती है. वे इसके विकासक्रम को समझने तथा चंद्रमा की धूल से निपटने की काट सुझायेंगे. ये चंद्रमा की सतह पर बर्फ तलाशेंगे. इसमें कामयाब रहे तो भविष्य में इसे पीने के पानी, सांस लेने की हवा और रॉकेट ईंधन में बदला जा सकेगा।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा