Navbharat Nishanebaaz : भारत सरकार का रुख लाजवाब, कोई सवाल न पूछो जनाब

Political Satire: संसद में प्रश्नकाल बंद है, इसलिए सवाल पूछना छोड़ दीजिए। अपनी बुद्धि मंद रखकर चुपचाप शकरकंद खाइए और प्रश्नों के भंवर में फंसने के बजाय कुशल खिवैया बन जाइए।
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Parliament Question Hour Cancellation Satire: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, हम आपसे जनहित में कुछ सवाल पूछना चाहते हैं। हमें उम्मीद है कि आप उनका उत्तर अवश्य देंगे। इसके बाद हम उपप्रश्न करेंगे, उसका भी जवाब आपको देना पड़ेगा। प्रश्नोत्तर का यह सिलसिला यूं ही चलता जाएगा।'

हमने कहा, 'सवालों का कभी अंत नहीं होता। इसलिए आप स्वावलंबी बनकर अपने प्रश्नों का हल खुद ही खोजिए। पहले अपने मन से पूछिए, फिर अंतरात्मा से. मौन रहिए, मेडिटेशन कीजिए, कुछ न कुछ जवाब खुद ही मिल जाएगा।'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, आप हमें टाल रहे हैं। प्रश्न हल करने की बजाय हमें छल रहे हैं। हमारी प्रश्नवाचक शक्ल देखिए और हमारे सवाल को बवाल समझकर मत ठुकराइए, हमारी जिज्ञासा पर अनुकूल रवैया अपनाइए, हमारा प्रश्न खास है जिसे लेकर मन में उठ रहा संत्रास है। आप जवाब देंगे, इसका पूरा विश्वास है।'

हमने कहा, 'सीधी बात है कि संसद में भी है प्रश्नकाल बंद, इसलिए छोड़ दीजिए सवाल पूछने का बेतुका छंद। हम आपकी जिज्ञासा पर लगा रहे प्रतिबंध, रखिए अपनी बुद्धि मंद, चुपचाप खाइए शकरकंद। सवालों के सागर में मत डुबोइए अपनी नैया। प्रश्नों के भंवर में न फंसते हुए बन जाइए कुशल खिवैया।'

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पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, समझ जाइए हमारी चालाकी। हमें लगी है प्रश्न पूछने की बीमारी। आप पर उत्तर देने की जिम्मेदारी। आप निशानेबाज हैं तो लगाइए परफेक्ट निशाना। सिर्फ उतना बताइए जितना आपने समझा और हमने जाना। अपने देश में लोकतंत्र है और सवाल-जवाब ही इसका असली मंत्र है। बढ़ रहा कॉकरोचों का असंतोष, जेन जी में आ रहा भरपूर जोश। सरकार है खामोश। हो रही है पेपरलीक, माहौल बिल्कुल नहीं ठीक ! सवालों को लेकर समझिए हमारे ज्वलंत जज्बात, इसलिए करने आए आपसे मुलाकात। गिरता जा रहा रुपया, बढ़ती बेरोजगारी, इससे निपटने की क्या है तैयारी? न तो आप पक्ष हैं न हम विपक्ष, न आप धर्मराज युधिष्ठिर, न हम प्रश्न पूछने वाले मायावी यक्ष ! चल रहा सवालों का सावन मास, मन में है बहुत आस!'

हमने कहा, 'हम समझ रहे हैं आपकी कठिनाई लेकिन सवाल पूछती सिर्फ ED या CBI (केंद्रीय जांच ब्यूरो)। सुन लीजिए स्व. कवि मधुपजी की कविता जिसमें उन्होंने लिखा- वकील साहब, सुना है आप बात-बात में पहेलियां बूझते हैं। कोई आपसे प्रश्न करता है तो आप उत्तर न देकर उसी से प्रश्न पूछते हैं। उत्तर मिला- जजसाहब, सच तो यह है कि अब भले लोगों का जमाना ही नहीं रहा। भला कहिए, मैं उत्तर न देकर प्रश्न पूछता हूं, यह आपसे किसने कहा?'

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