मोंटब्लैंक लक्ज़री पेन (डिजाइन फोटो)
World’s Most Expensive Pens: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज कंप्यूटर के जमाने में कलम की कीमत क्या रह गई! कंप्यूटर फ्रेंडली पीढ़ी कलम की दुश्मन बन गई है, अब तो हस्ताक्षर भी डिजिटल किए जाते हैं। किसी दफ्तर में जाओ तो इनेगिने लोगों की जेब में पेन मिलेगी। एक जमाना था जब पार्कर और शेफर्स जैसी पेन रखने वाला व्यक्ति नफीस मिजाज का और हैसियतदार माना जाता था।’
हमने कहा, ‘दुनिया में सबसे पुराना पेन गणेशजी के पास था। परशुराम अपने आराध्य शंकरजी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। गणेशजी ने उन्हें रुकने को कहा तो दोनों में युद्ध हुआ। परशुराम ने फरसे से प्रहार कर गणेशजी का दांत तोड़ दिया। गणेशजी ने उसी टूटे दांत को पेन की तरह इस्तेमाल किया। वेदव्यास श्लोकों का डिक्टेशन देते चले गए और गणेशजी ने पूरा महाभारत लिख डाला। एक श्लोक का अर्थ है कि यदि असित गिरी नामक काले पर्वत को समुद्र के जल में घोलकर स्याही बनाने के बाद वटवृक्ष को टहनी को लेखनी बनाकर देवी सरस्वती कितना भी लिखें तो भगवान विष्णु के यश का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकतीं।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, 1950 के दशक में स्कूली बच्चे स्याही की दवात में होल्डर या टाक डुबोकर लिखा करते थे। हर वाक्य के बाद होल्डर की निब को दवात में डुबोना पड़ता था। मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यास ऐसी ही कलम से लिखे थे। इसके बाद स्याही भरने वाली फाउंटेन पेन प्रचलित हुई। तब कैमल, सुलेखा, पार्कर इंक जैसे ब्रांड की स्याही मिला करती थी। 1960 के बाद बॉलपेन और फिर रोलर पोन प्रचलित हुए। आज सस्ती यूज एंड थ्रो वाली 5 रुपए की पेन से लेकर करोड़ों रुपए वाली पेन भी उपलब्ध हैं। मांट ब्लांक ने जिसे फ्रेंच में मां ब्लां कहा जाता है, 223,000 डॉलर या 2।07 करोड़ रुपए की नई पेन सीरीज जारी की है। इन रंगबिरंगी कलमों पर सुंदर सुनहरी डिजाइन है। शौकीन व कद्रदान धनवान लोग इस पेन को खरीदकर अपने कलेक्शन में रख सकते हैं।’
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हमने कहा, ‘कलम संग्रहित करने से क्या फायदा! वह लिखने के लिए होती है। लेखकों की कलम क्रांति ला सकती है। पत्रकारों को कलम का सिपाही माना जाता रहा है। क्रांतिकारियों के प्रेरणास्त्रोत गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से ‘प्रताप’ नामक अखबार निकाला था जिसमें कुछ समय शहीद-ए-आजम भगतसिंह ने भी काम किया था। माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ नामक पत्र निकाला था। ‘नवभारत’ ने 1934 से प्रकाशित होकर राष्ट्रीय चेतना जगाई थी। आजादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारों के बारे में कहा गया था जो कलम सरीखे टूट गए पर झुके नहीं, उनके आगे ये दुनिया शीश नवाती है, जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, वो तो मशाल की तरह उठाई जाती है।’