ममता और राष्ट्रपति मुर्मू के बीच टकराव ( सोर्स : शोसल मीडिया )
President Murmu Mamata Row: नाम तो तीनों के ‘म’ अक्षर से हैं, लेकिन उनके मन नहीं मिलते। मिलने की दूर-दूर तक कोई संभावना भी नहीं है। मन की बात सुनाने वाले मोदी से भी ज्यादा ममता का अहं या ‘इगो’ है। जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब भी ममता की अकड़ कायम थी। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ फरक्का बांध पर वर्चा करने के लिए बांग्लादेश जाने से इनकार कर दिया था।
उन्होंने मगरूरी के साथ कहा था कि मैं इस बूढ़े के साथ क्यों जाऊं? प्रोटोकॉल से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। जब जगदीप धनखड़ बंगाल के गवर्नर थे तब भी ममता उनकी कोई परवाह नहीं करती थीं।
अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति मुर्मू बंगाल के सिलीगुड़ी स्थित फांसीदेवा पहुंची। ममता उस प्रोग्राम में शामिल नहीं हुई। मोदी ने इसे राष्ट्रपति का अपमान माना और कहा कि टीएमसी ने सारी हदें पार कर ली हैं। मुर्मू ने भी कहा कि ममता उनके लिए छोटी बहन की तरह हैं। समझ में नहीं आता कि ममता या उनका कोई मंत्री उनसे मिलने क्यों नहीं पहुंचा।
उधर ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति को बीजेपी ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए भेजा और मुर्मू बीजेपी की इस राजनीति में फंस गई हैं। राष्ट्रपति जब साल में 50 बार और खासकर विधानसभा चुनाव के समय लगातार दौरे करें त्ती हर समय मेरे मौजूद रहने की उम्मीद करना गलत है। इस तरह राष्ट्रपति ने भी ममता के विद्रोही तेवर देख लिए, मोदी की इच्छा है कि बीजेपी बंगाल पर कब्जा कर ले।
सुबंदु अधिकारी से उन्होंने उम्मीद लगा रखी है लेकिन लेफ्ट पार्टियों को बंगाल से उखाड़ फेंकने वाली ममता को हिला पाना आसान नहीं है। नाम तो है ममता लेकिन हमेशा गुस्से और तनाव से भरी रहती हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव के समय जब तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा वहां प्रचार करने गए थे तो ममता ने बीजेपी के शीर्ष नेताओं को बाहरी लोग बताते हुए कहा था, कहां से चले आते हैं ये नड्डा-चड्डा पड्डा! प्रधानमंत्री मोदी ने भी तब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसी लंबी दाढ़ी बढ़ा ली थी तथा ममता को चुनौती देते हुए अपनी हर रैली में जोर से ललकारते थे दीदी, ओ दीदी! पिछली बार सफलता नहीं मिली।
एक पैर पर प्लास्टर बंधा होने पर भी ममता जीत गईं तो इस बार एसआईआर से वार कर बड़ी तादाद में वोटरों के नाम काट दिए, बीजेपी अकेले चुनाव नहीं लड़ती। आरोप है कि वह चुनाव आयोग और केंद्रीय जांच एजेंसियों की मदद लेती है।
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विपक्ष मुक्त भारत का लक्ष्य रखने वाली बीजेपी के लिए ममता बनर्जी आंख की किरकिरी के समान हैं। बिहार में नीतीश को आगे रखकर विधानसभा चुनाव जीता फिर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर राज्यसभा में भेज दिया।
बीजेपी की इस कूटनीति के सामने नीतीश चूं तक नहीं कर पाए। अब बिहार के बाद पड़ोसी राज्य बंगाल की बारी है लेकिन कुछ भी हो, दीदी बीजेपी पर बहुत भारी हैं। वहा न हिंदुत्व का मुद्दा चलता है न जातिवाद का जोर। यूपी और बिहार के हथकंडे बंगाल में काम नहीं आते।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा