राहुल गांधी (डिजाइन फोटो)
MM Naravane Book Parliament Row: स्मार्ट फोन के इस युग में भी किताबों का महत्व कम नहीं हुआ है। अपने बयान और शब्दों की ताकत से कुछ किताबें तहलका मचा देती हैं। किसी किताब से कंट्रोवर्सी पैदा होती है और सरकार की चालढाल को लेकर विपक्ष भूचाल लाना चाहता है। यदि किताब विवादास्पद हो तो उसे पढ़ने की उत्सुकता जागृत हो जाती है। लोग जानना चाहते हैं कि उसमें ऐसी क्या खास बात है, जो जनमानस को चौंका सकती है।
फिलहाल पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक ‘फोर स्टार्स टु डेस्टिनी’ ने चाय की प्याली में तूफान ला दिया है। संसद में हंगामाखेज माहौल बन गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पुस्तक के एक पत्रिका में प्रकाशित अंश को पढ़कर बताना चाहा कि 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत व चीन के संघर्ष के दौरान चीनी टैंक भारत के क्षेत्र में आ गए थे। जब जनरल नरवणे ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को फोन किया कि चीनी टैंक कैलाश रिज तक पहुंच गए हैं तो हमें क्या करना चाहिए? इस पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से पूछने पर भी कोई जवाब नहीं मिला। जब नरवणे ने एक बार फिर राजनाथ को फोन किया तो उन्होंने कहा कि वह टॉप से पूछेंगे। राहुल ने पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी डरे हुए हैं। उन्होंने सेना को चीन से लड़ने नहीं दिया।
सरकार का दावा था कि पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है और संसदीय समिति की समीक्षा में विचाराधीन है। पुस्तक की प्रकाशक कंपनी पेंगुइन रैंडम हाउस इस संबंध में मौन है। इस पर राहुल ने किताब सामने लाकर सरकार के दावे को गलत साबित किया और कहा कि यदि पीएम लोकसभा में आएं तो वह उन्हें जनरल नरवणे की पुस्तक भेंट करेंगे ताकि वह इसे पढ़ सकें और देश को हकीकत मालूम हो सके। नियमावली का उल्लेख कर या राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील देकर राहुल को बोलने से रोका गया तथा विपक्ष के 8 सांसदों को बजट सत्र की शेष अवधि तक लोकसभा से निलंबित कर दिया गया। जिस पुस्तक के अंश सार्वजनिक हो चुके हैं, उनका उल्लेख भी सरकार सहन नहीं कर पा रही है।
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तथ्य यह है कि भारत और चीन 2020 की स्थितियों से आगे बढ़ चुके हैं। दोनों देशों के बीच सैन्य स्तरीय चर्चा के 23 दौर हो चुके हैं। राजनीतिक चर्चाओं के बावजूद सीमा पर तनाव कायम है। ऐसी स्थिति में विपक्ष के नेता कुछ बोलना चाहें तो उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चचां केवल औपचारिकता नहीं है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का विपक्ष को हक है। अब ऐसा आभास होने लगा है कि सदन के अध्यक्ष सरकार का बचाव करने के लिए विपक्ष को दबाने की नीति पर चलते हैं। निष्पक्षता इसी में है कि विपक्ष को भी बोलने का अवसर दिया जाए।