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नवभारत संपादकीय: जनादेश को लग गया दलबदल का ग्रहण, पंजाब-बंगाल के बाद महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर
- Written By: आकाश मसने
Maharashtra Political Crisis: देश में चुनी हुई सरकारों और जनमत पर दलबदल का संकट गहरा गया है। महाराष्ट्र से बंगाल तक सिद्धांतों को ताक पर रखकर जारी सियासी उठापटक ने लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती दी है।

जनादेश को लग गया दलबदल का ग्रहण (डिजाइन फोटो)
Operation Tiger In Maharashtra: जनादेश को दलबदल का ग्रहण लग गया है। पार्टी निष्ठा टिकाऊ की बजाय बिकाऊ हो चुकी है। नैतिकता का तकाजा है कि जिस पार्टी के टिकट पर चुनकर आए उसमें रहना पसंद नहीं है तो पद से इस्तीफा दो और फिर से चुनाव लड़ो! कम से कम उन मतदाताओं से विश्वासघात तो मत करो, जिन्होंने पार्टी के प्रत्याशी के रूप में जिताया था। जाहिर है कि बड़े ही सधे हुए तरीके से विपक्षी पार्टियों को तोड़कर दलबदल कराया जा रहा है।
शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सदस्य संजय राउत का आरोप है कि उनकी पार्टी के सांसदों की हॉर्सट्रेडिंग हुई है। दलबदल के लिए प्रत्येक सांसद को 50 करोड़ रुपये देना तय हुआ है, जिसमें से 15 करोड़ रुपये बतौर एडवांस दिए गए हैं। यह है ऑपरेशन टाइगर जिसमें उद्धव की पार्टी के 6 बागी सांसदों को नांदेड, पुणे और मुंबई से चार्टर्ड प्लेन द्वारा दिल्ली लाया गया।
पंजाब-बंगाल के बाद महाराष्ट्र की बारी
2022 में शिवसेना की सबसे बड़ी फूट हुई थी जब उद्धव ठाकरे की नाक के नीचे से एकनाथ शिंदे बगावत कर 40 विधायक और 12 सांसद अपने साथ ले गए थे। अब दूसरी बार शिंदे ने अपना कमाल दिखाया। लोग मानते हैं कि यह सब बड़ी प्लानिंग के तहत हो रहा है। पंजाब और बंगाल के साथ महाराष्ट्र की बारी आई है। पहले आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सदस्य बीजेपी में चले गए। फिर बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी का किला ध्वस्त होते ही टीएमसी के 28 सांसदों में से 20 ने लोकसभा अध्यक्ष से सदन में अलग बैठने की मांग की। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए एक अनजान-सी पार्टी एनसीपीआई में विलय का ऐलान कर दिया।
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सत्ता का खेल: भय, प्रलोभन और दो-तिहाई बहुमत की जंग
पिछली बार महाराष्ट्र में ऑपरेशन लोटस हुआ था लेकिन इस बार एकनाथ शिंदे ने ऑपरेशन टाइगर कर दिखाया। आखिर इसका सूत्रधार कौन है? विपक्षी पार्टियों को तोड़ने से प्रत्यक्ष लाभ किसे होने वाला है? इसे समझना कठिन नहीं है। संसद में महिला आरक्षण बिल की आड़ में परिसीमन विधेयक दो तिहाई बहुमत से पास कराने में मिली विफलता के बाद बीजेपी नेतृत्व समझ गया कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। विपक्षी पार्टियां तोड़ो और दो-तिहाई बहुमत जुटाओ। इसके लिए दो तरीके जाने-पहचाने हैं, भय या प्रलोभन! केंद्रीय जांच एजेंसियों का डर व दबाव या फिर मोटी रकम का लालच! जब लेने और देने वाला दोनों चुप रहे तो ऐसी सौदेबाजी का सबूत नहीं मिल पाता।
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दलबदल विरोधी कानून की काट खोजी
विगत वर्षों में राजनीतिक पार्टियों ने दलबदल विरोधी कानून की काट खोज निकाली है। दो-तिहाई सदस्य पार्टी छोड़कर अलग गुट बना लें तो कानून भंग नहीं होता। पैसे और पावर के सामने सिद्धांत, आदर्श, प्रतिबद्धता, विचारधारा कुछ भी नहीं टिक पाते। जनविश्वास छला जा रहा है और राजनीति घोड़ा बाजार बनकर रह गई है। मत्स्यन्याय इसे ही कहते हैं जिसमें बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Maharashtra political crisis anti defection law operation tiger
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