नवभारत संपादकीय: एनए अनुमति की शर्त हटने से कृषि पर प्रभाव

Maharashtra Land Policy: महाराष्ट्र सरकार ने गैरकृषि (NA) अनुमति की शर्त हटाकर भूमि उपयोग नीति बदली है। इससे शहरीकरण बढ़ेगा, पर खेती, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।
Navbharat Editorial: Removal of NA permission condition impacts agriculture
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Non Agricultural Land Rules: महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की भूमि उपयोग नीति में आधारभूत परिवर्तन करते हुए गैरकृषि भूमि (एनए) की अनुमति लेने की शतं रद्द कर दी। इससे जहां शहरीकरण को बढ़ावा मिलेगा वहीं कृषि पर विपरीत असर पड़ने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

खेती की जमीन का उपयोग निवास, व्यावसायिक या औद्योगिक कारण से किया जाए, इसके लिए भूमि को नॉन एग्रिकल्चर होने की शर्त पूरी करनी पड़ती थी। राजस्व विभाग की छानबीन तथा स्थानीय प्लानिंग अधारिटी की रिपोर्ट के बाद ही एनए की मान्यता दी जाती थी।

इस प्रक्रिया में विलंब होता था व दिक्कतें आती थीं और भारी भ्रष्टाचार होने की शिकायत भी मिलती थीं। इसे देखते हुए अकृषक अनुमति की प्रक्रिया सरल करनी चाहिए था लेकिन यह शर्त पूरी तरह रद्द कर देने से खाद्यान्न सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। महाराष्ट्र में पहले ही औद्योगिकरण, महामार्ग निर्माण, टाउनशिप, लॉजिस्टिक पार्क निर्माण तथा बढ़ते शहरीकरण की वजह से कृषि भूमि घटती जा रही है।

जहां पहले खेत हुआ करते थे, वहां तक शहरों का विस्तार हो गया है। सरकार की दलील है कि विकास के ब्लू प्रिंट में स्थानीय प्राधिकरण की निर्माण संबंधी अनुमति मिल जाने के बाद फिर से राजस्व विभाग की अनुमति लेने में कौन सा तुक है? मोटे तौर पर यह तर्क सही नजर आता है क्योंकि एनए कराने की शर्त हट जाने से उद्योग व गृहनिर्माण को गति मिलेगी, निवेशक का समय पर काम हो सकेगा।

इस तरह यह कदम राज्य के हित में रहेगा लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी देखना होगा। राज्य के अधिकांश शहरों में अनधिकृत लेआउट बना लिए गए हैं जहां बिजली, पानी, सड़क की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। नालों को पाटकर भी निर्माण किया गया है। नगर नियोजन की परवाह न करते हुए बेढ़ब तरीके से नई बस्तियां बनाई गई हैं।

इस पर अकृषक अनुमति की शर्त से कुछ अंकुश था लेकिन अब वह भी हट जाने से शहर के विस्तार में आसपास के सारे गांव भी आ जाएंगे। अनियोजित व अनियंत्रित विकास की वजह से पहले ही जलापूर्ति, कचरा प्रक्रिया व सीवेज की समस्या बढ़ी है।

सड़क, विद्युत तथा सार्वजनिक परिवहन की चुनौती उत्पन्न हुई है। शहर सुंदर और व्यवस्थित रहने की बजाय बेतरतीब तरीके से फैल गए हैं। अवैध निर्माण का लोग नियमितीकरण करा लेते हैं।

क्या महापालिकाओं के पास इस विस्तार को संभालने व नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के साधन हैं? बस्तियां बढ़ेंगी तो लोगों को रहने के लिए घर मिलेंगे। उद्योग भी बढ़ेंगे लेकिन निर्माण की अनुमति देते समय उपलब्ध जलस्रोत, पर्यावरण पर पड़नेवाले प्रभाव, कृषि क्षेत्र घट जाने जैसी बातों पर भी विचार करना होगा, आज शहरीकरण की वजह से जमीनों के दाम काफी बढ़ गए हैं।

अकृषक अनुमति की शर्त हटाने के बाद यदि अन्न संकट हुआ तो क्या विदेश से अनाज लाकर खिलाएंगे? यदि भविष्य में अव्यवस्था हुई तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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