नवभारत विशेष: अब चलेगी स्वदेश निर्मित हाइड्रोजन ट्रेन, 17 जुलाई को भारत रचेगा इतिहास
India Hydrogen Train: 17 जुलाई को PM नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद से भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। यह परियोजना स्वच्छ रेल परिवहन की दिशा में देश का महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
- Written By: अंकिता पटेल
हाइड्रोजन ट्रेन (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो )
World Longest Hydrogen Train: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 17 जुलाई को देश की सर्वप्रथम, उत्सर्जन रहित हाइड्रोजन ट्रेन को हरियाणा के जींद में हरी झंडी दिखाएंगे। ब्राड गेज पर दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन की पहल के साथ भारत ब्रिटेन को परीक्षण के दौर में छोड़ जर्मनी, जापान, फ्रांस, चीन, कनाडा और अमेरिका जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल ही नहीं, बल्कि आगे हो जाएगा।
जन साधारण के मन में सवाल है कि यह ट्रेन जींद से ही क्यों? इसका किराया सस्ता होगा या महंगा ? 2018 में शुरू करने के बाद जर्मनी भारी परिचालन लागत और बुनियादी ढांचे की कमी के चलते अपनी हाइड्रोजन ट्रेन 2 साल पहले से ही वापस ले रहा है। फ्रांस भी हाथ आजमाने के बाद आगे नहीं बढ़ रहा। जापान ने 2022 में इसे शुरू किया पर विकास पर विराम है।
हाइड्रोजन ट्रेनें हर रूट के लिए नहीं, सिर्फ खास इलाकों के लिए
चीन की हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन टेस्ट ऑपरेशन चला रही है, पर प्रोडक्शन की रफ्तार सुस्त है। जापान ने कभी अपनी ट्रेन की लंबाई नहीं बढ़ाई जबकि भारत ने जर्मन ट्रेन से 5 गुना लंबी ट्रेन बनाई है। जब विदेशों में इसको पूरी तरह ‘सफल और आर्थिक रूप से व्यवहारिक’ नहीं कहा जा रहा, तो हम इधर क्यों रुख कर रहे हैं? सामान्य डीजल इंजन की लागत 20 करोड़ रुपये बैठती है।
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जबकि एक हाइड्रोजन ट्रेनसेट की अनुमानित लागत लगभग 80 करोड़ रुपये है और इसके ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर या रिफ्यूलिंग स्टेशन पर प्रति रूट 70 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, भारत का उद्देश्य विकसित देशों की तरह अंधाधुंध पूरी रेलवे को हाइड्रोजन पर ले जाना नहीं वरन ऐसे पहाड़ी, दुर्गम या ऐतिहासिक विरासत वाले रूट पर ट्रेन चलाना है, जहां भौगोलिक कारणों से बिजली वाली ट्रेन नहीं चला सकते और डीजल इंजनों के इस्तेमाल से पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने की बजाय स्वच्छ शांत पर्यावरणानुकूल यात्रा सुनिश्चित करना चाहते हैं। ऐसे रूट रेल के कुल नेटवर्क से तीन फीसदी से भी कम होंगे, इसलिए मात्र 35 छोटे रूट का ही प्रस्ताव है।
स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन: हरित भविष्य की ओर भारत का बड़ा कदम
हाइड्रोजन ट्रेन केवल उन पहाड़ी या हेरिटेज रूटों के लिए आरक्षित है जहां ट्रेनें लगातार कई घंटों तक बिना किसी ग्रिड कनेक्टिविटी के चलती हैं और जहां ऊंचाई पर बैटरी का वजन बहुत भारी हो जाता है। कुल मिलाकर सीमित परिचालन के चलते भारत का जोखिम और लागत जर्मनी वगैरह के मुकाबले बहुत कम है।
परीक्षण या प्रथम परिचालन के लिए जींद से सोनीपत के 89 किलोमीटर के रूट का चयन इसलिए, क्योंकि यह इतना छोटा है कि शुरुआती दौर में पायलट इसे मैनेज कर सके, साथ ही इतना लंबा है कि रेंज को स्ट्रेस-टेस्ट कर सके। जींद में 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण करने वाला प्लांट भी है।
विदेशी मॉडल को सीधे कॉपी करने के बजाय भारतीय रेलवे ने ‘रेट्रोफिटिंग’ मॉडल अपनाते हुए मौजूदा डीजल-इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट या डेमू ट्रेनों के इंजन और डिब्बों को पूरी तरह बदले बिना, उनमें स्वदेशी रूप से विकसित हाइड्रोजन फ्यूल सेल और बैटरी सिस्टम फिट किया। इससे नई ट्रेन खरीदने की लागत बच गई। तकनीक ऐसी कि हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन चलाने के दौरान बिजली भी बनाएगा।
पूरी ट्रेन की लाइटिंग व एसी इसी से चलेगी यानी आत्मनिर्भर भारत की अनूठी मिसाल है यह परियोजना। यह निवेश रेलवे के ‘नेट जीरो कार्बन एमिशन 2030’ के लक्ष्य का हिस्सा है, जिससे भविष्य में डीजल आयात पर होने वाले अरबों रुपये के विदेशी मुद्रा खर्च की बचत होगी। भारत के लिए यह परियोजना केवल एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि हरित ऊर्जा, स्वदेशी प्रौद्योगिकी और भविष्य की सतत परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है।
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17 जुलाई को भारत रचेगा इतिहास
भारत का उद्देश्य विकसित देशों की तरह अंधाधुंध पूरी रेलवे को हाइड्रोजन पर ले जाना नहीं वरन ऐसे पहाड़ी, दुर्गम या ऐतिहासिक विरासत वाले रूट पर ट्रेन चलाना है, जहां भौगोलिक कारणों से बिजली वाली ट्रेन नहीं चला सकते और डीजल इंजनों के इस्तेमाल से पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने की बजाय स्वच्छ शांत पर्यावरणानुकूल यात्रा सुनिश्चित करना चाहते हैं।
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा
