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संपादकीय: रणनीतिक स्वायत्तता पर टिकी विदेश नीति

BRICS Summit: बदली वैश्विक परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति अब ‘व्यूहात्मक स्वायत्तता’ की ओर बढ़ी है, जहां क्वाड और ब्रिक्स दोनों में भागीदारी को राष्ट्रहित का संतुलन बताया जा रहा है।

  • Written By: अंकिता पटेल
Updated On: Jan 24, 2026 | 07:38 AM

प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )

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नवभारत डिजिटल डेस्क: कांग्रेस शासन में भारत की घोषित विदेश नीत्ति गुटनिरपेक्षता के अलावा सभी के साथ मित्रता व शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की थी। अब परिस्थितिवश उसमें बदलाव आया है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और विदेशमंत्री एस. जयशंकर के प्रयासों के बावजूद हर किसी से मित्रता संभव नहीं है क्योंकि चीन, तुर्किए, पाकिस्तान और बांग्लादेश का रवैया भारतद्वेषी बना हुआ है।

ट्रंप की टैरिफ की धमकी की वजह से अमेरिका-भारत संबंध भी प्रभावित हुए हैं। इन परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति अब व्यूहात्मक स्वायत्तता की हो गई है। लाभप्रद व गुणात्मक आधार पर अन्य देशों से रिश्ते तय करने का मानस राष्ट्रहित में है।

इसलिए भारत क्वाड संगठन में अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान के साथ शामिल है तो दूसरी ओर वह ब्रिक्स का भी सदस्य है जिसमें रूस, चीन, द. अफ्रीका व ब्राजील की भागीदारी है। यह भारत के हितों के लिहाज से किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है।

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गत 13 जनवरी को जयशंकर ने भारत में होनेवाली ब्रिक्स शिखर परिषद के लिए प्रतीक चिन्ह का अनावरण किया, ब्रिक्स का उद्देश्य डॉलर मुक्त आपसी व्यापार है जिसमें वैकल्पिक मुद्रा के इस्तेमाल पर सहमति हो सकती है।

फिलहाल ब्रिक्स में पूर्ण सदस्यता वाले 10 देश तथा 10 सहयोगी देश हैं। इनकी संख्या बढ़कर 26 होने की संभावना है। ब्रिक्स देशों में विश्व की 48 प्रतिशत आबादी तथा 41 फीसदी जीडीपी है जो कि जी-7 के विकसित देशों से ज्यादा है। चीन और रूस ने अंतरराष्ट्रीय बैंक प्रणाली ‘स्विफ्ट’ की बजाय अपनी अलग प्रणाली शुरू की है।

इसमें 30 प्रतिशत व्यापार ऐसा होगा जिसमें डॉलर की जरूरत नहीं पड़ेगी। ऐसे में अमेरिका अपना 38 खरब डॉलर का भारी कर्ज चुकाने की क्षमता खो बैठेगा, 2015 में शंघाई में न्यू डेवलपमेंट बैंक शुरू किया गया जो दक्षिणी एशिया के देशों में स्टार्टअप की मदद करने के अलावा विश्व बैंक व आईएमएफ का विकल्प भी पेश करेगा।

इसके बावजूद चीन से संबंध सुधरने की संभावना नहीं है क्योंकि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। विस्तारवादी चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव योजना से भारत सहमत नहीं है। सीमा पर तनाव के मुद्दे पर मोदी व शी जिनपिंग के बीच 2018 में बैठक हुई लेकिन 2020 में गलवान में दोनों देशों के सैनिकों का हिंसक संघर्ष हुआ।

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अमेरिका के दबाव में भारत ने रूस से तेल खरीद में काफी कटौती की है। अभी तक भारत-अमेरिका व्यापार समझौता नहीं हो पाया है। अमेरिका व ईरान की बढ़ती शत्रुता को देखते हुए चाबहार बंदरगाह में भी अपने हितों को भारत छोड़ सकता है। ट्रंप का पहला कार्यकाल भारत से मित्रता दशनिवाला नजर आया था।

अब दोनों देशों के बीच यदि तनाव है तो उसके लिए ट्रंप का बदला हुआ रवैया जिम्मेदार है। यदि ट्रंप के दबाव के सामने भारत झुकता है तो वह द। एशिया में नेतृत्व नहीं कर सकेगा। इतना अवश्य है है कि रचनात्मक सहयोग का रास्ता खोजा जाना उपयुक्त रहेगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

India foreign policy strategic autonomy brics quad

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Published On: Jan 24, 2026 | 07:38 AM

Topics:  

  • BRICS Summit
  • China
  • India
  • Navbharat Editorial

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