India AI Investment ( सोर्स: सोशल मीडिया )
India Digital Public Infrastructure: यह वही भारत है, जिसने फिछले दशक में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना-आधार, यूपीआई और डिजिलॉकर-के माध्यम से दुनिया के सामने एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है। इन प्रणालियों ने भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। भारत में पहले से ही दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम मौजूद है और एआई-आधारित स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
नैसकॉम के अनुसार, भारत में एआई से संबंधित स्टार्टअपन की संख्या 2020 से 2025 के बीच लगभग दोगुनी हो चुकी है। भारत को इस आयोजन से तीन प्रमुख क्षेत्रों में लाभ मिलने की संभावना है-निवेश, नीति निर्माण और वैश्विक प्रभाव, जब वैश्विक निवेशक और तकनीकी कंपनियां किसी देश में इस स्तर की उपस्थिति दर्ज कराती हैं, तो इसका सीधा अर्थ होता है कि वे वहां निवेश की संभावनाएं देख रही हैं। एआई के क्षेत्र में निवेश केवल पूंजी का प्रवाह नहीं लाता, बल्कि इसके साथ तकनीक, विशेषज्ञता और वैश्विक नेटवर्क भी आता है।
यदि इस समिट के बाद भारत में एआई अनुसंधान केंद्र, डेटा सेंटर और नवाचार प्रयोगशालाएं स्थापित होती हैं, तो यह भारत की तकनीकी क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है। दूसरा महत्वपूर्ण लाभ है नीति निर्माण में भारत की भूमिका का बढ़ना।
एआई नैतिकता, गोपनीयता और रोजगार से भी जुड़ा हुआ है। दुनिया भर में एआई के नियमन को लेकर बहस चल रही है और इस संदर्भ में भारत की आवाज का महत्व चढ़ना स्वाभाविक है। एआई का विकास केवल कॉर्पोरट हितों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखे।
तीसरा लाभ है वैश्विक प्रभाव और प्रतिष्ठा। आज की दुनिया में तकनीकी शक्ति ही वास्तविक शक्ति का आधार बनती जा रही है। जिस देश के पास एआई और अन्य उन्नत तकनीकों में नेतृत्व होगा, वहीं भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करेगा।
भारत इस वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में एक गंभीर दावेदार बन चुका है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस आयोजन के बाद एआई के क्षेत्र में ठोस कदम उठाए जाएं।
इसमें अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना, और उद्योग-अकादमिक सहयोग को मजबूत करना शामिल है। भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। हर साल लाखों इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ देश से निकलते हैं।
लेकिन चुनौती यह है कि इन प्रतिभाओं को एआई जैसे उन्नत क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाए और उन्हें देश में ही अवसर प्रदान किए जाएं, यदि भारत इस दिशा में सफल होता है, तो वह न केवल एआई का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है, बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत के पास यह अवसर है कि वह एआई के विकास का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करें, जो तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को भी प्राथमिकता दे, यदि भारत इस अबसर को सही दिशा में आगे बढ़ाता है, तो यह समिट भविष्य में उस ऐतिहासिक क्षण के रूप में याद की जाएगी, जब भारत ने वैश्विक एआई नेतृत्व की ओर निर्णायक कदम बढ़ाया था। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि यह समिट कितनी अद्भुत थी, बल्कि यह है कि भारत इसे अपने भविष्य को अद्भुत बनाने के लिए किस तरह उपयोग करता है।
दिल्ली में आयोजित एआई समिट को केवल एक तकनीकी सम्मेलन कहना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह आयोजन उस वैश्विक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत इंग्लैंड और फ्रांस जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देशों से हुई और जिसे दक्षिण कोरिया जैसे नवाचार-केंद्रित राष्ट्रों ने आगे बढ़ाया।
इस श्रृंखला में दिल्ली का जुड़ना इस बात का संकेत है कि भारत केवल एआई का उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक एआई तंत्र का सक्रिय सहभागी और संभावित नेतृत्वकर्ता बन चुका है।
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भारत के लिए यह आयोजन इसलिए अहम है क्योंकि यह उसकी तकनीकी और कूटनीतिक दोनों क्षमताओं की स्वीकृति का प्रतीक है। अब तक एआई के वैश्विक विमर्श पर अमेरिका, यूरोप और चीन का वर्चस्व रहा है। ऐसे में दिल्ली में समिट का आयोजन दिखाता है कि भारत को एक ‘विश्वसनीय तकनीकी शक्ति’ के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
–लेख नरेंद्र शर्मा के द्वारा