नवभारत विशेष: भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव, अवैध प्रवासियों को वापस भेजने में दिक्क्तें
Illegal Migrants Deportation: भारत और बांग्लादेश के बीच अवैध प्रवासियों की घर वापसी का मुद्दा गहरा गया है। ढाका के असहयोग और सीमा पर दोनों देशों के सुरक्षा बलों में तनातनी से कूटनीतिक गतिरोध बढ़ा।
- Written By: आकाश मसने
अवैध बांग्लादेशी (डिजाइन फोटो)
India-Bangladesh Illegal Migrant Dispute: गृह मंत्रालय ने बीते महीने यह घोषणा की थी कि उसके पास इन्हें बांग्लादेश भेजने की पूरी कार्य योजना तैयार है। लेकिन यह योजना बीच में ही अटकी हुई है। डिपोर्ट का मामला डिटेंशन से आगे नहीं बढ़ पा रहा है यानी बस होल्डिंग सेंटर तक। सवाल है कि बांग्लादेश अगर इन्हें अपना नागरिक मानने, उनकी पहचान करने से इनकार कर देता है, तो फिर क्या होगा? उन्हें कैसे वापस भेजा जाएगा?
बांग्लादेश इसे अपनी संप्रभुता का मामला बना अवैध प्रवासियों को अपना न मानने की हठधर्मी पर उतारू है, ऐसे में बांग्लादेशी होने का स्वयंभू दावा करने वाले अवैध प्रवासी न घर के रहेंगे न घाट के! सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़ा ऐसे प्रवासियों की संख्या डेढ़ से दो करोड़ बताता है। एक ही महीने में दोनों देशों की सीमा सुरक्षा बलों के बीच कई बार आमना-सामना और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिल चुका है। बांग्लादेश सरकार भी आंखें तरेर रही है कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल मौका देखकर भारतीयों को या जो प्रमाणिक तौर से बांग्लादेश के नहीं हैं अथवा रोहिंग्या शरणार्थी हैं, उन्हें गलत तरीके से उनके देश में धकेल रहा है।
8 महीनों की 2,479 लोगों को बांग्लादेश
बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल 7 मई से इस साल 26 जनवरी तक 8 महीनों की अवधि में भारत से 2,479 लोगों को बांग्लादेश में धकेला गया। इनमें से कम से कम 120 लोगों की पहचान बाद में भारतीय नागरिकों के रूप में हुई, जबकि कुछ रोहिंग्या शरणार्थी भी थे।
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असम के मुख्यमंत्री ने बताया था तरीका
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि बांग्लादेशी नागरिकों को विदेश मंत्रालय के जरिए आधिकारिक तरीके से वापस भेजना बहुत मुश्किल है। इसमें बहुत देर लगेगी। इसके बजाय लोगों को ‘रात के अंधेरे का फायदा उठाकर, उन जगहों पर जहां बीडीआर (अब बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश) मौजूद नहीं होती, वापस धकेल दिया जाता है। भारतीय सीमा सुरक्षा बल ऐसे लोगों को तब तक ही हिरासत में रखता है, जब तक उन्हें वापस बांग्लादेश भेजने का सही मौका नहीं मिल जाता।’
सरमा की टिप्पणियों को द्विपक्षीय संबंधों के लिए ‘अपमानजनक’ बताते हुए बांग्लादेश मानवाधिकार हनन संबंधी मुद्दे भी उठा रहा है। भारत का यह तर्क उचित है कि जिन व्यक्तियों की पहचान बांग्लादेशी नागरिक के रूप में हो चुकी है, उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया में ढाका को अधिक सक्रिय सहयोग करना चाहिए। सन 2000 में उसने 2,868 मामले बांग्लादेश को नागरिकता सत्यापन के लिए भेजे मगर बांग्लादेश ने आज तक कोई जवाब नहीं दिया। बांग्लादेश के असहयोग ने मामले को पेचीदा बना दिया है।
भारत-बांग्लादेश कूटनीतक तनाव बढ़ा
बांग्लादेश में फरवरी 2026 में तारिक रहमान की बीएनपी सरकार के सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार द्विपक्षीय संबंधों में गर्मजोशी लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन अवैध प्रवासन का मुद्दा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की कसौटी बन गया है।
भारत को अपनी वैध सुरक्षा चिंताओं पर दृढ़ रहना ही चाहिए, बांग्लादेश को तो सीमा पर बाड़बंदी से भी आपत्ति है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। इतनी विशाल सीमा पर तनाव पैदा करना आसान है, लेकिन विश्वास बनाना कठिन। इसलिए समय की मांग यह है कि दोनों देश आरोपों और प्रत्यारोपों के बजाय संयुक्त सत्यापन तंत्र, तेज राजनयिक समन्वय और मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दें।
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लगभग 2 करोड़ हैं घुसपैठिए
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कहा था कि अगर भाजपा बंगाल में सत्ता में आती है, तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को चुन-चुनकर खदेड़ा जाएगा। पर जो लोग अवैध रास्ते से भारत आए थे, अगर ‘स्वेच्छा से’ वापस लौटना चाहें तो उनके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा।
सरकार आते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं पर एक्शन शुरू किया। गृहमंत्री के बयानों के चलते अवैध प्रवासी अब तलाशने नहीं पड़ रहे, बल्कि भविष्य के भय से वे खुद बाल-बच्चों समेत हर रोज सीमा पार कर बांग्लादेश में दाखिल होने के लिए 24 परगना के सीमावर्ती इलाकों में पहुंच रहे हैं।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा
