सड़क के गड्ढे नहीं होंगे दुरुस्त (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, हमें बताइए कि खराब सड़कों का क्या इलाज है? गड्ढों के बीच सड़क खोजनी पड़ती है। इसके अलावा जहां देखो वहां खुदा, इधर खुदा, उधर खुदा।’ हमने कहा, ‘सड़क पर चलते समय खुद सावधानी बरतिए। भगवान ने आंख किसलिए दी है? गड्ढे से बचकर चलिए। फिर भी गिर गए तो संभलकर उठ जाइए। एक शेर है- गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हम मैदान की नहीं, उबड़-खाबड़ सड़क के गहरे गड्ढों की बात कर रहे हैं। ठेकेदार और अफसरों की मिलीभगत से निकृष्ट सड़कें बनती हैं। ऊपर की पतली परत निकलते ही महीने भर में गड्ढे चंद्रमा के धरातल के समान अपना मुंह खोल देते हैं। इन गड्ढों की वजह से एक्सीडेंट होते है और डाक्टरों को कमाई का जरिया मिल जाता है। असली बात यह है कि प्रशासन के विभागों में आपसी समन्वय बिल्कुल भी नहीं है। एक विभाग सड़क बनाता है फिर केबल डालनेवाले उसे खोद कर मिट्टी-पत्थर, मलबा भरकर चल देते हैं। इसके बाद जलवाहिनी और सीवेजवाले अपनी सुविधा और फुरसत से सड़क की खुदाई करते हैं। एक साथ तालमेल से काम किया जाए तो बार-बार सड़क खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’
हमने कहा, ‘फिर ठेकेदारों को काम कैसे मिलेगा? रिपेयरिंग, मरम्मत, रिकारपेंटिंग के बिल कैसे तैयार होंगे? सड़क ही नहीं, अंडरब्रिज में भी गंदा पानी बहता है, कीचड़ फैलता है और अंधेरा रहता है। लोग जान हथेली पर लेकर सफर करते हैं। अफसरों को ऐसी खटारा सड़कों का मुआयना करने भेजना चाहिए जब उनकी गाड़ी पलटेगी तो अक्ल आएगी और वह सड़क को मजबूत बनाने पर ध्यान देंगे।’
ये भी पढ़ें– नवभारत विशेष के लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, राजनीति की गाड़ी हिचकोले खा सकती है लेकिन अफसर की गाड़ी कभी पंक्चर नहीं होगी। आपको मालूम होना चाहिए कि कितनी ही मोटी तनख्वाह दो, अफसर भ्रष्टाचार करना नहीं छोड़ता। सिस्टम ऐसे ही चलता है। ऐसी अव्यवस्था देखकर कहा जा सकता है- अफसर करे ना चाकरी, मंत्री करे ना काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम!’
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा