नवभारत विशेष: बीजिंग-मास्को गठजोड़ भारत के लिए चुनौती, हमारी रक्षा सप्लाई चेन पर असर
Beijing Moscow Alliance: बीजिंग-मास्को गठजोड़ व पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा व कनेक्टिविटी चुनौतियां बढ़ सकती है। सस्ते क्रूड के साथ सप्लाई स्थिरता पर ध्यान जरूरी माना जा रहा है।
- Written By: अंकिता पटेल
चीन-रूस गठजोड़, ऊर्जा संकट,(सोर्स: सोशल मीडिया)
China Russia Energy Partnership: बीजिंग-मास्को संबंध में पावर संतुलन बहुत अधिक चीन के पक्ष में है, जिससे बीजिंग का केंद्रीय एशिया व यूरेशिया में एकछत्र आर्थिक राज हो जायेगा। भारत फिलहाल ब्रिक्स का अध्यक्ष है, लेकिन ईरान पर अमेरिका व इजराइल के हमले के संदर्भ में किसी प्रकार का कोई वक्तव्य जारी नहीं किया। युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद कर दिया गया, जिससे तेल, गैस आदि का भारी संकट उत्पन्न हो गया है और महंगाई भी बढ़ती जा रही है। इस पृष्ठभूमि में बीजिंग-मास्को के गठजोड़ की वजह से चीन रूस का बुनियादी ऊर्जा पार्टनर बन गया है, जिससे रूसी तेल व गैस के लिए गहन प्रतिस्पर्धा हो गई है।
हालांकि भारत अपने घरेलू हितों को साधने के लिए सस्ता क्रूड हासिल कर ही रहा है, लेकिन चीन रूस की एनर्जी पाइपलाइन डायनामिक्स के चलते सप्लाई स्थिरता व दामों को बनाये रखने के लिए भारत को सक्रिय प्रबंधन की आवश्यकता पड़ेगी। चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को बढ़-चढ़कर प्रमोट कर रहा है, तो ऐसे में बीजिंग मास्को गठजोड़ के कारण केंद्रीय एशिया में भारत-समर्थित कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स हाशिये पर आ सकते हैं। इससे बचने के लिए दिल्ली को चाहिए कि विकल्पों पर अधिक ध्यान दे।
ईरान में चाहबार पोर्ट को बीच में छोड़ना भी कोई अक्लमंदी नहीं थी। उस पर पुनःविचार किया जाये। दिल्ली को चाहिए कि रूस से अपने संबंध मजबूत करने के सिलसिले में बहुत अधिक फोकस किया जाये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मास्को के पास बीजिंग से अलग भी विकल्प हों। नई विश्व व्यवस्था तेजी के साथ विकसित होती जा रही है। हाल ही में रूस के राष्ट्रपति वाल्दिमीर पुतिन की दो दिन की चीन यात्रा के दौरान बीजिंग व मास्को ने 7,000 शब्दों का एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया था, जिसमें विशेष रूप से इस बात पर बल दिया गया कि ‘ताकत व स्थिरता के लिहाज से दोनों देश अपने इतिहास के सबसे अच्छे समय का अनुभव कर रहे हैं।
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इस माह के आरंभ में पुतिन ने रूस के राष्ट्रपति के रूप में नया कार्यकाल आरंभ किया। इसके बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए उन्होंने चीन को चुना। इस प्रतीक को अनदेखा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यूक्रेन संकट के बाद मास्को की निर्भरता बीजिंग पर बढ़ी है और इन दोनों देशों की बढ़ती दोस्ती को पश्चिम अपने लिए गंभीर खतरे के रूप में देखता है। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने सार्वजनिक तौर पर चीन की धमकी दी थी कि अगर रूस से उसकी दोस्ती बढ़ती रहेगी तो वाशिंगटन उस पर अतिरिक्त पाबंदियां लगायेगा, पश्चिम का मानना है कि चीन की मदद के कारण ही रूस यूक्रेन पर अपने हमले को जारी रखे हुए है।
चीन इस समय ड्राइविंग सीट में है। इसलिए भी दिल्ली के लिए आने वाले वर्षों में रूस-चीन गठजोड़ का प्रबंधन करना सबसे महत्वपूर्ण विदेश नीतिक चुनौती होगी। भारत अपने सैन्य उपकरणों व टेक्नोलॉजी के लिए रूस पर निर्भर करता है, जो प्रभावित हो सकता है। इसके अतिरिक्त चीन व रूस के बीच आर्थिक सहयोग क्षेत्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स व व्यापार मागों में भारत को हाशिये पर डाल सकता है। एससीओ व ब्रिक्स जैसे वैधिक मंचों पर भी भारत का प्रभाव कम हो सकता है।
हमारी रक्षा सप्लाई चेन पर असर
अमेरिका की दादागिरी समाप्त होने के बाद जो नई विश्व व्यवस्था बन रही है, उसमें चीन व रूस की बढ़ती दोस्ती भारत के लिए चुनौती उत्पन्न कर रही है। भारत एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां अब उसके लिए एक रास्ते का चयन करना मजबूरी होता जा रहा है।
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बीजिंग-मास्को गठजोड़ से भारत की रक्षा सप्लाई चेन जटिल हो गई है। क्योंकि रूस के सैन्य हार्डवेयर पर भारत बहुत अधिक निर्भर है। रूस के लिए कठिन होता जा रहा है कि वह भारत को वो एडवांस्ड टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराये, जिससे चीन नाराज हो जाये। इससे बचने के लिए ही भारत सक्रिय तौर पर स्ट्रेटेजिक स्वायत्तता का विस्तार कर रहा है।
लेख- शाहिद ए चौधरी के द्वारा
