संपादकीय: क्यों कम हो रहा बैंकों का डिपॉजिट? जानिए इसका देश पर क्या हो रहा असर
Bank Deposit Crisis: घरेलू बचत घटने से बैंक डिपॉजिट में भारी कमी आई है। लोग अब शेयर व म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं। अनाकर्षक ब्याज दर और ऊंचा टैक्स बैंक बचत को कमजोर कर रहा है।
- Written By: आकाश मसने
प्रतीकात्मक तस्वीर (डिजाइन फोटो)
Household Savings Decline India: हाल के वर्षों में घरेलू बचत कम हुई है। यद्यपि लोगों की हा कमाई बढ़ी है, लेकिन बचत की इच्छा हतोत्साहित हुई है। लोग अपनी बुनियादी जरूरतों पर खर्च करने के अलावा अपनी वित्तीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए धन का इस्तेमाल कर रहे हैं। घरेलू कर्ज बढ़ा है और गत वर्ष मार्च में जीडीपी के 41 प्रतिशत को पार कर गया है। लोग बैंक में रकम जमा कराने की बजाय शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने लगे हैं। यह बदलाव पिछले 8-9 वर्षों में आया है। 2016-17 में घरेलू वित्तीय संसाधनों का 60 प्रतिशत बैंक डिपॉजिट के रूप में रहता था। अब बैंक डिपॉजिट घटकर 35 प्रतिशत के आसपास आ गया है।
इक्विटी और म्यूचुअल फंड बढ़कर 4 गुना हुआ
पिछले 5 वर्षों में इक्विटी और म्यूचुअल फंड बढ़कर 4 गुना हो गया है। इसमें कोई अनोखी बात नहीं है, क्योंकि इस तरह के निवेश से कंपनियों को अपने कारोबार के विकास के लिए पूंजी उपलब्ध होती है। दिक्कत यह है कि बैंकों के पास डिपॉजिट की भारी कमी हो गई है। कर्ज और डिपॉजिट का अनुपात 100 प्रतिशत होने जा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह बैंकों की अनाकर्षक ब्याज दर है। 3 वर्ष रकम जमा करने पर केवल 6.3 प्रतिशत की दर से ब्याज मिलता है। ब्याज पर स्लैबरेट के हिसाब से टैक्स भी लगाया जाता है, जो कभी 30 प्रतिशत भी हो सकता है। इसके विपरीत शेयर मार्केट या इक्विटी में टैक्स का ढांचा अनुकूल है। शेयर मार्केट 8 से 9 प्रतिशत तक रिटन देता है।
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बाजार से जुड़ा निवेश जोखिम भरा होने पर भी अधिक फायदेमंद है। टैक्स की दरों ने घरेलू बचत के व्यवहार को बदला दिया है। बैंक डिपॉजिट व निश्चित आय के प्रस्ताव आकर्षण खो बैठे हैं। इस स्थिति को गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि कमजोर बैंक डिपॉजिट से अर्थव्यवस्था को मिलने वाला धन का प्रवाह कमजोर हो जाएगा। बैंक की बचत को टैक्स मुक्त किए जाने पर लोग बैंको में रकम जमा कराने के प्रति उत्साहित होंगे। इससे अर्थव्यवस्था के लिए धन उपलब्ध होगा।
दूसरी ओर एक चमकता इक्विटी मार्केट भी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। नीति निर्धारकों ने भी वित्तीया विविधीकरण को प्रोत्साहित किया है। चिंता सिर्फ यह है कि बैंकों का डिपॉजिट कम होने लगा है। बैंक में जमा रकम पर स्लैब रेट के मुताबिक टैक्स नहीं लगाने से सरकारी खजाने को राजस्व की हानि होगी, लेकिन इससे बैंकों की ताकत बढ़ेगी और उनकी कर्ज देने की क्षमता में वृद्धि होगी। अभी यह क्षमता कमजोर हो रही है। बैंकों की साख के विस्तार में कमी आने से व्यापक अर्थव्यवस्था को अधिक नुकसानदायक परिस्थितियों से गुजरना होगा।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
