पाक के नक्शेकदम पर चल रहा बांग्लादेश (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: बांग्लादेश में पाकिस्तान ‘एंटी-इंडिया’ भावना को मजबूत बनाने वाली और 1971 के मुद्दों पर नरम रुख रखनेवाली पर है, जो यूनुस के सुधारों का समर्थन करती हो।सबसे ज्यादा अपेक्षाएं बांग्लादेशियों की हैं।वे नई सरकार से आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार पर रोक, महंगाई पर नियंत्रण, बेरोजगारी दूर करना, बिजली की बेहतर आपूर्ति, संविधान में सुधार, कानून व्यवस्था की बहाली तथा आवामी लीग के अत्याचारों पर जवाबदेही चाहते हैं।बांग्लादेश में 40 से अधिक पंजीकृत पार्टियां चुनाव मैदान में होने के बावजूद मुकाबला 10 दलों वाले बांग्लादेश जमाते इस्लामी गठबंधन और बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी में ही है।शेख हसीना की आवामी लीग चुनाव से बाहर है, तो मामला द्विदलीय हो गया है।
जमाते इस्लामी का मुख्य मुद्दा है इस्लामी कानून लागू करवाकर धार्मिक न्याय व शासन स्थापित करना, सेक्युलरवाद और समाजवाद को हटाना और पश्चिमी प्रभाव का विरोध।एनसीपी यानी नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी, जो पिछले साल ही युवा विद्रोह के दौरान बनी है।फिलहाल भारी खटपट के बावजूद जमाते इस्लामी के साथ है और खुद को तीसरी ताकत के रूप में पेश कर रही है, जबकि बीएनपी उसे महज वोट-कटवा मानती है।उसका लक्ष्य है, प्रखर राष्ट्रवाद, आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार विरोध, संस्थागत सुधार और युवा राजनीति को बढ़ावा देना।बीएनपी का भी वादा राष्ट्रवाद, आर्थिक सुधार, सत्ता विकेंद्रीकरण है।बांग्लादेश में वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाली एनसीपी को जमात-ए इस्लामी की बी टीम भी कहा जा रहा है और वह जमाते इस्लामी की छोड़ी हुई 19 सीटों पर ही लड़ रही है।जमात-ए- इस्लामी पिछले दिनों बीएनपी के साथ आने की मंशा जाहिर कर चुकी है, बीएनपी इसके लिए उत्सुक नहीं है फिर भी ऐसे में गठबंधनों का चेहरा चुनाव या उसके बाद बदल सकता है।
आवामी लीग के वोटरों की विचारधारा जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ तो है पर उसके वोटरों का छोटा हिस्सा धार्मिक रुझान को समर्थन देते हुए ग्रामीण इलाकों में उसकी ओर जाएगा ही, लेकिन वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अगर जमात-ए-इस्लामी हथियाने में कामयाब रहता है तो वह बहुमत के आसपास नजर आ सकती है।लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के बीएनपी को सत्ता-विरोधी माहौल का फायदा मिल सकता है।17 साल बाद स्वदेश लौटे खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान को जिया की मौत के बाद भावनात्मक लाभ मिल सकता है, उन्हें परिणाम को प्रभावित कर सकने वाला जनसमर्थन भी है और उन्हें प्रधानमंत्री के बतौर पेश भी किया जा रहा है।अगर सर्वे सही है कि बीएनपी 33 फीसद तो जमात 29 प्रतिशत और एनसीपी 16 फीसद मतदाताओं की पसंद हैं।युवाओं में भी पहली पसंद बीएनपी और दूसरी जमात-ए-इस्लामी है।चुनाव के बाद या उससे पहले अप्रत्याशित गठबंधन, एनसीपी की खींचतान, युवा और शहरी मतदाता का रुझान, सोशल मीडिया-प्रभावित नैरेटिव, आवामी लीग के मतदाताओं का प्रत्याशित और एकमुश्त वोट ट्रांसफर वगैरह चुनावी नतीजों को या सरकार के गठन को लेकर चुनावी विश्लेषकों को चौंका सकते हैं।
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चुन-चुनकर हिंदुओं की हत्या, हिंदू महिलाओं के साथ दुष्कर्म और पाकिस्तान के नक्शे कदम पर चलते हुए अपनी क्रिकेट टीम को भारत में टी-20 विश्व कप के लिए न भेजने का फैसला।बांग्लादेश भारत के लिए पूरी तरह से दूसरा पाकिस्तान बन गया है और जिस तरह की हवा बह रही है, उससे लगता यही है कि आगामी चुनावों के बाद भी स्थिति कोई खास बदलने वाली नहीं है।ऐसे में जरूरी है कि दिल्ली बांग्लादेश को लेकर अपने पारंपरिक रवैये को बदले।उम्मीद है बांग्लादेश में 20 फरवरी 2026 तक एक चुनी हुई सरकार सत्ता संभाल ले.
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा