वट सावित्री व्रत (सौ.सोशल मीडिया)
हिंदू धर्म में सभी प्रकार के व्रत और त्योहारों का महत्व होता है। यहां पर सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखा जाता है साथ जीवन में सुख-समृद्धि की कामना भी की जाती है। वट सावित्री व्रत दो तिथि अमावस्या और पूर्णिमा पर मनाई जाती है। 26 मई और 10 जून को यह व्रत अलग-अलग जगहों के लिए बेहद खास होता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन वट सावित्री व्रत की पूजा विधि-विधान के साथ करती है लेकिन इस व्रत से जुड़ी कुछ मान्यताएं और परंपराएं भी है जिसे महिलाए निभाती है।
ऐसी ही एक परंपरा बिहार राज्य से आती है जहां पर बहुएं सास के चरण छू कर उन्हें सुहाग की वस्तुएं दान करती हैं और उनका सम्मान करके आशीर्वाद लेती हैं। इस प्रकार की परंपरा को नई बहुएं सबसे पहले निभाती है। चलिए विस्तृत रूप से जानते हैं इस परंपरा के बारे में…
इस खास परंपरा का चलन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार-झारखंड में सबसे ज्यादा होता है। यहां पर बहुएं अपनी सास को बायना देती है इसे सुहाग पिटारी या सौभाग्य पिटारी के रूप में जाना जाता है। नियम के अनुसार, सास को दिए जाने वाली सुहाग पिटारी में बहुएं बहुत सारी वस्तुओं भीगे हुए चने, पूरी, प्रसाद, फल, सिंदूर, सीसा, काजल, मेंहदी, चूड़ी, बिंदी, बिछिया, साड़ी आदि एक बांस की टोकरी या फिर किसी स्टील के डिब्ले में रखकर दी जाती है। इसके अनुसार, क्षमता के अनुसार दक्षिणा देकर सास के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। पूजा की थाली में कई चीजों को शामिल किया जाता है जैसे धूप, दीप, घी, बांस का पंखा, लाल कलावा, सुहाग का सामान, कच्चा सूत, बरगद का फल, जल भरने के लिए कलश और थाल से इस व्रत में थाली सजाई जाती है।
आपको बताते चलें कि, वट सावित्री की शुभ तिथि के दिन आप विधि-विधान के साथ व्रत कर सकते है।
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यहां पर जिस तरह से वट सावित्री का व्रत महिलाओं के लिए बेहद खास होता है उस तरह ही इसे लेकर पुरूष भी उत्साहित रहते है।यह तिथि न सिर्फ महिलाओं के लिए बल्कि पुरुषों के लिए भी विशेष है. इस खास दिन बड़ के पेड़ की पूजा और परिक्रमा कर सास को बायना रख कर दिया जाता है।