आखिर गुरु नानक जयंती पर क्यों खिलाया जाता है लंगर, पहली बार कब शुरु हुई थी लंगर की परंपरा
हर कार्तिक पूर्णिमा को सिख समुदाय के पहले गुरु गुरुनानक जी के जन्मदिन के मौके पर मनाते है।गुरुद्वारे में लंगर के अलावा सिख धर्म के लोग चप्पल-जूता घर से लेकर लंगर की रसोई तक में अपनी सेवा देकर गुरु जी का आशीर्वाद पाते हैं।
- Written By: दीपिका पाल
गुरु नानक जयंती (सौ.सोशल मीडिया)
Gurunanak Jayanti 2024: आज कार्तिक पूर्णिमा के साथ ही सिख धर्म के पर्व गुरुनानक जयंती भी मनाई जा रही है इसका महत्व काफी होता है। हर कार्तिक पूर्णिमा को सिख समुदाय के पहले गुरु गुरुनानक जी के जन्मदिन के मौके पर मनाते है। इस खास दिन के मौके पर सभी गुरुद्वारों में अलग सी रौनक होती है और सिख धर्म के अनुयायी गुरुद्वारा पहुंचकर अरदास करते है।
इस मौके पर अखंड पाठ और कीर्तन का आयोजन होने के साथ ही लंगर भी खिलाया जाता है। सिख धर्म के लोग इस परंपरा को सबसे खास मानते हैं जो सदियों से चली आ रही है। चलिए जानते है पहली बार कब शुरु हुआ लंगर औऱ क्या है इसके पीछे की पौराणिक कहानी।
गुरुद्वारे में लोग मानते हैं इसे सेवा
यहां पर सिख समुदाय के लोगों द्वारा कई परंपरा अपनाई जाती है जिनका नाता काफी पुराना है। गुरुद्वारे में लंगर के अलावा सिख धर्म के लोग चप्पल-जूता घर से लेकर लंगर की रसोई तक में अपनी सेवा देकर गुरु जी का आशीर्वाद पाते हैं। यहां पर लंगर को भोजन परोसने से जोड़कर देखा जाता है इसमें केवल खास मौकों ही नहीं बल्कि छोटे से बड़े गुरुद्वारे में लंगर की खास व्यवस्था की जाती है।
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इस गुरुद्वारा में आने वाले सभी लोगों यानि इसमें कोई धर्म या जाति के लोगों को भोजन परोसा जाता है। इसमें हर गरीब और जरुरतमंदों को लंगर के तहत खाना परोसा जाता है।
गुरू पूर्णिमा पर लंगर की शुरुआत (सौ.सोशल मीडिया)
किसने की थी पहले लंगर की शुरुआत
यहां पर धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जानें तो, सिख धर्म के पहले गुरु, गुरुनानक देव जी ने अपने अनुयायी के लिए लंगर की परंपरा शुरू की थी। इसके पीछे प्रचलित एक कथा के अनुसार, एक बार गुरुनानक देवजी के पिता ने उन्हें अपना बिजनेस शुरु करने के लिए पैसे दिए थे लेकिन उन्होंने इसका व्यापार शुरु करने की बजाय नानक देव जी ने साधु-संतों को भोजन करा दिया और उन्हें कंबल भी दिया।
नानक जी के इस फैसले पर उनके पिता बहुत गुस्सा हुए। इसके बाद पिता की नाराजगी को दूर करते हुए गुरुनानक जी ने कहा कि, इन जरूरत मंदों को भोजन कराने में सच्चा लाभ और खुशी मिलती है। इसके बाद से लंगर खिलाने की यह परंपरा आज तक चली आ रही है।
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जानिए कैसे चलता है लंगर
यहां पर गुरु नानक जी के स्थान गुरुद्वारे में लंगर की परंपरा शुरु रहती है जहां पर लोगों की सेवा की जाती है। इस लंगर की परंपरा में अपनी नि:स्वार्थ भाव से लोग सेवा का नियम करते हैं। लंगर के मौके पर हर वर्ग के लोग एक साथ जमीन पर बैठ कर भोजन खाते हैं। यहां पर केवल सिख धर्म विशेष नहीं बल्कि किसी भी धर्म और जाति के लोग लंगर में शामिल हो सकते है। गुरुद्वार के लंगर में सब एक लाइन से नीचे बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। सिखों के तीसरे गुरु अमरदास जी का कहना है कि, लंगर का भोजन आपको करना चाहिए इससे आपको भगवान का आशीर्वाद मिलता है और आप ईश्वर के करीब जाते है।
