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जीवन में तरक्की और मन की शांति चाहिए? संत प्रेमानंद जी महाराज बोले, ये 2 आदतें आज ही छोड़ दें!

Rules of The Path of Devotion: आध्यात्मिक शांति पाना चाहते हैं, तो संतों की सीख आपके बहुत काम आ सकती है। श्री प्रेमानंद जी महाराज ने साधकों को स्पष्ट संदेश दिया है भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना है।https

  • Written By: सिमरन सिंह
Updated On: Feb 23, 2026 | 07:33 PM

Premanand ji maharaj (Source. Pinterest)

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Premananda Ji Maharaj Discourse: अगर आप रोज़मर्रा की भागदौड़, तनाव और जिम्मेदारियों के बीच भी आध्यात्मिक शांति पाना चाहते हैं, तो संतों की सीख आपके बहुत काम आ सकती है। श्री प्रेमानंद जी महाराज ने साधकों को स्पष्ट संदेश दिया है भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना है तो दो चीज़ों का तुरंत त्याग करें। उनका कहना है कि यह मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है, इसे व्यर्थ की बातों में गंवाना सबसे बड़ी भूल है।

1. निंदा छोड़ें, वरना भजन होगा कमजोर

महाराज जी कहते हैं कि भक्ति की सबसे बड़ी बाधा है दूसरों की निंदा करना और सुनना। उनके शब्दों में, “यदि आप किसी की निंदा करते हैं, तो वह दोष आप में बहुत अधिक मात्रा में आ जाएगा।” भजन करने वाले व्यक्ति के लिए हल्का सा गलत शब्द भी साधना में बाधा बन जाता है। इसलिए वे स्पष्ट निर्देश देते हैं कि जहाँ किसी की बुराई हो रही हो, वहाँ से तुरंत हट जाएं या अपने कान बंद कर लें। निंदा सुनने में मन को आनंद जरूर आता है, लेकिन यह भीतर के पुण्य को नष्ट कर देता है। किसी का उपहास करना या दोष ढूंढना अंततः आत्मिक पतन का कारण बनता है।

2. दोष मत देखो, हर जगह भगवान का स्वरूप देखो

विशेष रूप से वृंदावन में रहने वालों के लिए महाराज जी का संदेश और भी सख्त है। उनका कहना है कि जिसे राधा रानी ने अपने धाम में स्थान दिया है, उसमें दोष देखने का हमें कोई अधिकार नहीं। यदि अनजाने में भी किसी में कमी दिख जाए, तो दूर से प्रणाम कर क्षमा मांग लें। सच्चा साधक वही है जो हर जीव में अपने आराध्य का रूप देखे। वृक्ष, पशु-पक्षी, लता सबमें ईश्वर का अंश मानकर सम्मान करें।

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अभिमान छोड़ें, विनम्रता अपनाएं

भक्ति की वृद्धि के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है। चाहे रूप का घमंड हो, धन का या शक्ति का—हर प्रकार का अभिमान गिरावट की ओर ले जाता है। महाराज जी समझाते हैं कि जब हृदय पूरी तरह विनम्र होकर नाम जप करता है, तभी प्रेम का प्रकाश भीतर प्रकट होता है। बिना दैन्य भाव के सच्ची साधना संभव नहीं।

गृहस्थ भी पा सकते हैं मुक्ति

जो लोग परिवार में रहते हैं, उनके लिए भी मार्ग खुला है। परिवार को भगवान का स्वरूप मानकर सेवा करें, लेकिन उनमें मोह न रखें। मोह से मुक्त होकर गृहस्थ जीवन जीना भी एक प्रकार का संन्यास है।

सत्संग और नाम जप ही असली सहारा

समय अनमोल है। “सब दिन होत न एक समान,” इसलिए हर पल का सदुपयोग करें। सत्संग आत्मा के लिए तीर्थ के समान है। निरंतर नाम जप और भगवान का आश्रय ही माया से मुक्ति का मार्ग है।

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बस दो बातें याद रखें

आगे बढ़ना है तो:

  • किसी के दोष न देखें।
  • विनम्र भाव से राधा-नाम का आश्रय लें।

इन्हीं दो बातों में भक्ति की संपूर्ण दिशा छिपी है।

Want progress and peace of mind saint premanand ji maharaj says give up these two habits today

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Published On: Feb 23, 2026 | 07:33 PM

Topics:  

  • Premanand Maharaj
  • Religion
  • Sanatana Dharma

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