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Shukrawar Vrat: शुक्रवार का व्रत कर रहे हैं? वैभव लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए जरूर पढ़ें यह कथा

Shukrawar Vrat Katha: मां लक्ष्मी का एक स्वरूप वैभव लक्ष्मी भी है और उनकी कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन वैभव लक्ष्मी व्रत रखा जाता है। कहते हैं इस व्रत को रखने से आर्थिक संकट दूर होते हैं।

  • Written By: रीता राय सागर
Updated On: Jun 12, 2026 | 07:39 AM

शुक्रवार व्रत कथा(फोटो.एआई)

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Shukrawar Vrat Katha In Hindi: सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी को समर्पित है। शुक्रवार का व्रत माता लक्ष्मी की कृपा और धन-समृद्धि पाने के लिए किया जाता है। इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने इसकी पूजा नियम विधि के साथ किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही शुक्रवार के व्रत की कथा का पाठ नियम से करना चाहिए। इससे वैभव लक्ष्मी प्रसन्न होती है और धन-धान्य से अपने भक्तों को परिपूर्ण करती है।

माता लक्ष्मी की व्रत कथा

एक शहर में बहुत से लोग रहा करते थे। सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए थे। शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होने लगे थे, लेकिन इन सबके साथ ही शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

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ऐसे ही लोगों में एक शीला और उसके पति रहते थे। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली महिला थी। उसका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और अपना सारा समय प्रभु भजन में व्यतीत करते थे। शहर में सब उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।

देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी। शराब, जुआ, चरस-गांजा जैसी बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसका पति अपना सब कुछ रेस-जुए में हार गया।

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। अब वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक मांजी खड़ी थी। उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था। उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उनको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला का रोम-रोम आनंदित हो उठा। शीला उस मांजी को आदर के साथ घर के अंदर ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाते हुए एक फटी हुई चादर पर उनको बिठाया।

मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मी जी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं। इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी, फिर मांजी बोलीं- तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आई, अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।

मांजी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल उठा। उसकी आंखों से आंसू झर-झर बहने लगे और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। मांजी ने कहा- बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता। मांजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह डाली।

कहानी सुनने के बाद मांजी ने कहा- कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए तू चिंता मत कर, अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएंगे। तुम माँ लक्ष्मी जी की भक्त हो और माँ लक्ष्मी तो प्रेम और करुणा की देवा है। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता बनाए रखती है। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। मांजी ने कहा- ‘बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे वरदलक्ष्मी व्रत या वैभव लक्ष्मी व्रत कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई नहीं था। वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां चली गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं।

दूसरे दिन शुक्रवार था। शीला ने सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहने और मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद आया। उनके मन में वैभव लक्ष्मी व्रत के लिए श्रद्धा बढ़ गई।

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक वैभव लक्ष्मी का व्रत किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी व्रत की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के धन लक्ष्मी स्वरूप की छबि का वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे मां धन लक्ष्मी! मैंने आपका वैभव लक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है।

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हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना, जो आपका यह चमत्कारी वैभव लक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है। ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के धनलक्ष्मी स्वरूप की छबि को प्रणाम किया।

व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। उनका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। वैभव लक्ष्मी व्रत का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक वैभव लक्ष्मी व्रत करने लगीं।

Shukrawar vrat katha of mata vaibhav laxmi in hindi

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Published On: Jun 12, 2026 | 07:39 AM

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