शीतला सप्तमी की कथा पढ़े बिना अधूरी रह सकती है पूजा, जानें पूरी कहानी
Sheetla Saptami Katha: शीतला सप्तमी पर माता शीतला की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। मान्यता है कि इससे व्रत का पूर्ण फल मिलता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
- Written By: सीमा कुमारी
शीतला सप्तमी(सौ. Gemini)
Sheetla Mata Ki Sampoorna Katha : आज शीतला अष्टमी का व्रत है। यह व्रत हर साल होली के बाद और नवरात्रि से पहले आता है। हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी का विशेष महत्व है, जिसे ‘बासौड़ा’ भी कहा जाता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाए जाने वाले इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत माता शीतला को लगने वाला भोग है।
इस दिन देवी को ताजा भोजन नहीं, बल्कि एक दिन पहले बना बासी और ठंडा पकवान अर्पित किया जाता है, जो शीतलता और आरोग्य का प्रतीक है।
देवी शीतला की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। पूजा के बाद देवी शीतला की व्रत कथा पढ़ने की परंपरा भी है। चलिए जानते है शीतला सप्तमी व्रत कथा
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शीतला सप्तमी व्रत कथा
शीतला सप्तमी की प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक समय की बात है एक दिन शीतला सप्तमी पर एक बुढ़िया माई और उसकी दो बहुओं ने व्रत रखा। उस दिन घर के हर सदस्य को बासी भोजन ग्रहण करना था इसलिए भोजन को एक दिन पहले ही तैयार कर लिया गया है।
लेकिन बुढ़िया की दोनों बहुओं को कुछ समय पहले ही संतान हुई थी इसलिए उन्हें डर था कि कहीं बासी भोजन खाने से उनकी संतान बीमार न हो जायें। इसी कारण से उन्होंने शीतला सप्तमी के दिन बासी भोजन ग्रहण न करके अपने लिए रोटी सेंक कर उनका चूरमा बनाकर खा लिया।
जब सास ने बासी भोजन ग्रहण करने को कहा तो बहुओं ने काम का बहाना बनाकर टाल दिया। उनके इस कृत्य से शीतला माता क्रोधित हो गईं और उनके नवजात शिशुओं की मृत्यु हो गई।
जब सास को अपनी बहुओं की गलती का पता चला तो उसने दोनों को घर से निकाल दिया। दोनों अपने शिशुओं के शवों को लेकर एक बरगद के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गईं। वहीं पर ओरी व शीतला नामक दो बहनें आईं जो अपने सर में पड़ी जुओं से बहुत परेशान थीं।
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दोनों बहुओं को उन पर दया आ गई और उन्होंने उनके सर से जुएं निकाल दीं जिससे उन्हें कुछ चैन मिला और उन्होंने बहुओं को आशीष दिया कि तुम्हारी गोद हरी हो जाये। बहुओं ने कहा कि हरी भरी गोद ही लुट गई है इस पर शीतला ने लताड़ लगाते हुए कहा कि पाप कर्म का दंड तो भुगतना ही पड़ता है।
बहुओं ने पहचान लिया कि ये साक्षात शीतला माता हैं दोनों माता के चरणों में पड़ गई और क्षमा याचना करने लगीं। माता को भी उनके पश्चाताप करने पर दया आ गई और माता ने उनके मृत बालकों को जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों खुशी-खुशी गांव लौट आयी। इस चमत्कार को देखकर सब हैरान रह गये। कहते हैं इसके बाद से पूरा गांव माता को मानने लगा और शीतला सप्तमी का व्रत रखने लगा।
