शनि जयंती की व्रत कथा (सौ.सोशल मीडिया)
आज 27 मई को ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि है। ज्योतिषयों के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या का संबंध शनि देव से भी है, क्योंकि इस दिन शनि देव का जन्म हुआ था। यही कारण है कि इसे शनि जयंती और शनि अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से शनि देव की पूजा और उनसे संबंधित उपाय करने के लिए शुभ माना जाता है।
शनि जयंती के दिन शनि देव की पूजा के दौरान ज्येष्ठ अमावस्या की व्रत कथा पढ़ने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है ।और जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती है। ऐसे में आइए पढ़ते हैं शनि जयंती की कथा।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनिदेव सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। एक बार की बात है, सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा अपने पति के तेज से बहुत परेशान रहती थीं। वे उनके तेज को सहन नहीं कर पाती थीं।
इसलिए, उन्होंने अपनी एक परछाई छाया बनाई, जिसका नाम संवर्णा था, और उसे अपनी जगह सूर्यदेव की सेवा में लगा दिया। संज्ञा ने संवर्णा से कहा कि वह उनके बच्चों मनु, यमराज और यमुना की देखभाल करे और यह रहस्य किसी को न बताए। इसके बाद, संज्ञा स्वयं अपने पिता के घर चली गईं।
संवर्णा ने पूरी निष्ठा से संज्ञा का रूप धारण कर सूर्यदेव की सेवा की और उनके बच्चों की देखभाल की। कुछ समय बाद, संवर्णा गर्भवती हुईं और उनके गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ। जब शनिदेव का जन्म हुआ, तो उनका रंग काला था और उनका स्वभाव भी थोड़ा गंभीर था।
सूर्यदेव को संवर्णा पर संदेह हुआ कि यह उनका पुत्र नहीं हो सकता, क्योंकि यह उनके जैसा तेजस्वी नहीं था। उन्होंने संवर्णा और शनिदेव का अपमान किया।
यह देखकर संवर्णा बहुत दुखी हुईं। कहा जाता है कि शनिदेव की मां छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिससे उनके शरीर में इतनी शक्ति आ गई कि गर्भ में पल रहे शनिदेव का रंग काला पड़ गया और उनका स्वभाव भी तपस्वी जैसा हो गया। जब सूर्यदेव ने शनिदेव का अपमान किया, तो शनिदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने सूर्यदेव की ओर देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही सूर्यदेव काले पड़ गए और उन्हें कुष्ठ रोग हो गया।
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सूर्यदेव अपनी इस दशा से बहुत परेशान हुए। उन्होंने भगवान शिव की आराधना की। तब भगवान शिव ने सूर्यदेव को बताया कि शनिदेव उनके ही पुत्र हैं और उनका अपमान करने के कारण ही उन्हें यह कष्ट मिला है। भगवान शिव के समझाने पर सूर्यदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने शनिदेव से क्षमा मांगी। इसके बाद सूर्यदेव को उनका पूर्व रूप वापस मिल गया।
तब से यह मान्यता है कि शनिदेव अपने भक्तों पर कृपा करते हैं, लेकिन जो लोग गलत कर्म करते हैं या उनका अपमान करते हैं, उन्हें उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। शनिदेव को ‘न्याय का देवता’ और ‘कर्मफल दाता’ भी कहा जाता है।