Mithun Sankranti: मिथुन संक्रांति 2026 कब है? जानें सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश का समय और धार्मिक महत्व
Mithun Sankranti: इस साल मिथुन राशि में सूर्य का प्रवेश जून महीने में होगा। मिथुन संक्रांति पर सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। आइए जानें इस दिन किन चीजों का दान करें और किन उपायों से मिलेगा शुभ फल।
- Written By: रीता राय सागर
मिथुन संक्रांति (फोटो.सोशल मीडिया)
Mithun Sankranti 2026 Date: ज्योतिषीय शास्त्र में सूर्यदेव को ग्रहों का राजा कहा जाता है। मिथुन संक्रांति को पूर्वी भारत में अशरह, दक्षिणी भारत में अनी और केरल में मिथुनम ओन्थ के नाम से जाना जाता है। यह वह दिन है जब सूर्य वृषभ राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से सूर्य के इन परिवर्तनों का अपना महत्व है। इन दिनों पूजा-अर्चना करनी चाहिए। ओडिशा में यह दिन बड़े उत्साह से मनाया जाता है और इस त्योहार को राजा पर्व के नाम से जाना जाता है। मिथुन संक्रांति 15 जून 2026 यानी सोमवार को है।
सूर्य देव वर्तमान में वृषभ राशि में विचरण कर रहे है। वो 15 जून 2026 को दोपहर में 12 बजकर 58 मिनट पर सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश होगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसे जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।
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समय
पुण्यकाल- दोपहर 12 बजकर 59 मिनट पर शुरू और शाम 07 बजकर 20 मिनट तक। पुणयकाल की अवधि 06.21 घंटे रहेगी।
महा पुण्यकाल- दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से 03 बजकर 19 मिनट तक। 02.20 घंटे तक रहेगी।
चार दिनों के इस त्योहार में बारिश का स्वागत किया जाता है। इस दिन अविवाहित लड़कियां गहनों से सजती हैं और विवाहित महिलाएं घर के कामों से छुट्टी लेकर खेलकूद का आनंद लेती हैं।
मिथुन संक्रांति पर होती है भगवान विष्णु की पूजा
इस दिन भगवान विष्णु और पृथ्वी की पूजा की जाती है। पत्थर को फूलों और सिंदूर से सजाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिस प्रकार धरती बारिश के लिए तैयार होती है, उसी प्रकार युवतियां विवाह के लिए तैयार होती हैं और ईश्वर से प्रार्थना करती हैं।
राजा पर्व की एक और आम रस्म बरगद के पेड़ की छाल पर झूले बांधना है, जिस पर लड़कियाँ झूलते और गाते हुए आनंद लेती हैं। राम डोली, दांडी डोली और चक्री डोली जैसे कई प्रकार के झूले होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि मिथुन संक्रांति जरूरतमंदों को कपड़े दान करने के लिए बहुत शुभ दिन है। अन्य सभी संक्रांति त्योहारों की तरह, इस दिन पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करना पवित्र माना जाता है और कई लोग ऐसा करने के लिए नदी तट पर स्थित मंदिरों में जाते हैं।
मिथुन संक्रांति पूजा विधि
मिथुन संक्रांति के दिन गंगा नदी में या घर के पानी में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर एक तांबे के लोटे में गंगाजल या साफ जल लें। अब उसमें लाल चंदन, लाल रंग के फूल, गुड़ आदि डाल कर सूर्यदेव के मंत्र का उच्चारण करते हुए उनको अर्घ्य दें। इसके बाद गायत्री मंत्र पढ़ें और आसन पर बैठकर सूर्य चालीसा का पाठ करें। आदित्य हृदय स्तोत्र का भी पाठ करें। अंत में सूर्यदेव की आरती करें।
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सिलबट्टे की भी होती है पूजा
सिलबट्टे को धरती मां का स्वरूप मानते हुए इन तीन दिनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। चौथे दिन सिलबट्टे को जल और दूध से स्नान कराया जाता है, फिर चंदन, सिंदूर और पुष्प अर्पित कर पूजा की जाती है। संक्रांति के दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। लोग अपनी श्रद्धा अनुसार गेहूं, गुड़, घी, अनाज व अन्य वस्तुओं का दान करते हैं।
मिथुन संक्रांति का संबंध स्त्री के मासिक चक्र से भी जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस अवधि में धरती माता विश्राम काल से गुजरती हैं। इसी कारण रज पर्व के दौरान खेत जोतना, जमीन खोदना या धरती को किसी भी तरह से कुरेदना वर्जित होता है।
