मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन, अब कैसे मनेगी ‘खिचड़ी’? यहां पढ़िए उपाय
khichdi Rules Ekadashi: मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी इस वर्ष 14 जनवरी को एक ही दिन पड़ रहे हैं। ऐसे दुर्लभ संयोग में एकादशी व्रत के नियम और खिचड़ी खाने के पारंपरिक उपाय जानना जरूरी है।
- Written By: सीमा कुमारी
मकर संक्रांति (सौ.सोशल मीडिया)
Makar Sankranti Shattila Ekadashi: 14 जनवरी 2026 को पूरे देशभर में मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जाएगा, जो सूर्य के उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन षटतिला एकादशी का व्रत भी पड़ रहा है, जो करीब 23 वर्ष बाद बन रहे दुर्लभ संयोग के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि यह दुर्लभ संयोग एक असमंजस भी पैदा कर रहा है। दरअसल, मकर संक्रांति पर चावल से बनी खिचड़ी दान करने और खाने की खास परंपरा है। यही कारण है कि कई जगहों पर मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। जबकि एकादशी के दिन चावल खाने की मनाही होती है। अब सवाल उठता है कि एकादशी के रहते मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान और भोग कैसे करें?
मकर संक्रांति 2026 पर खिचड़ी का दान और भोग कैसे करें?
ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, मकर संक्रांति पर इस वर्ष 23 वर्ष बाद एकादशी का शुभ संयोग बन रहा है। संक्रांति और एकादशी एक दिन होने के कारण इसे आध्यात्मिक रूप से अक्षय पुण्यफल देने वाला माना जाता है।
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ऐसा संयोग वर्ष 2003 में भी बना था और अब 23 साल बाद फिर से ऐसा हुआ है जब एकादशी और संक्रांति एक साथ पड़ गए हैं। जब भी ऐसा संयोग बनता है तो सबसे पहले ये देखा जाता है कि उस दिन एकादशी तिथि कितने बजे तक रहेगी।
पंचांग अनुसार माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी 14 जनवरी की शाम 5 बजकर 52 मिनट पर खत्म हो रही है। ऐसे में एकादशी तिथि के समाप्त होने पर चावल की खिचड़ी का सेवन और दान किया जा सकता है। इससे कोई दोष नहीं लगेगा।
हर नियम और बाध्यता से मुक्त होते हैं त्योहार
कई ज्योतिष विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि सनातन परंपरा में शुभ तिथियां और त्योहार किसी भी तरह के नियम और बाध्यता से मुक्त होते हैं। यही कारण है कि त्योहारों पर कोई भी शुभ कार्य बिना किसी संदेह के पूरा किया जा सकता है। ऐसे में इस दिन बिना किसी टेंशन के मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा सकता है और खिचड़ी का सेवन भी कर सकते हैं।
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मकर संक्रांति पर क्या करते हैं?
मकर संक्रांति के दिन श्रद्धालु सुबह पवित्र नदी के जल से स्नान करते हैं और फिर इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। फिर चावल, काली उड़द दाल, तिल और गुड़ का दान किया जाता है। इस दिन खिचड़ी का सेवन जरूर किया जाता है तो वहीं उत्तर भारत में कई जगहों पर इस दिन दही-चूड़ा खाने की भी विशेष परंपरा है।
