kunti karna (Source. Pinterest)
Karna Ke Janam Ka Rahasy: महाभारत की कथा में कर्ण का जन्म एक ऐसा प्रसंग है, जो आज भी लोगों के मन में जिज्ञासा जगाता है। अक्सर सवाल उठता है जब कर्ण का जन्म हुआ, तो आखिर कुंती के परिवार वालों को इसकी खबर क्यों नहीं लगी? क्या यह संभव है कि इतनी बड़ी घटना घर-परिवार से छिपी रह जाए? आइए इस रहस्य को सरल शब्दों में समझते हैं।
कुंती को यह दिव्य शक्ति महान तपस्वी दुर्वासा के आशीर्वाद से प्राप्त हुई थी। प्रसन्न होकर ऋषि ने उन्हें विशेष मंत्र दिए थे, जिनकी सहायता से वे किसी भी देवता का आह्वान कर संतान प्राप्त कर सकती थीं। यह कोई साधारण वरदान नहीं था, बल्कि दिव्य सिद्धि थी, जो केवल आस्था और मंत्रबल से फलित होती थी।
उस समय कुंती अविवाहित और किशोरी थीं। मन में उत्सुकता थी कि क्या यह वरदान सचमुच फल देगा? इसी जिज्ञासा में उन्होंने एकांत में जाकर सूर्य देव का मंत्र जप लिया। मंत्र के प्रभाव से स्वयं Surya प्रकट हुए और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्रदान किया। यही बालक आगे चलकर महाभारत का महान योद्धा कर्ण बना। यह पूरी घटना अत्यंत गोपनीय और अल्प समय में घटित हुई। न कोई धूमधाम, न कोई साक्षी सब कुछ एकांत में हुआ।
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अविवाहित अवस्था में पुत्र का जन्म उस युग में सामाजिक अपमान का कारण बन सकता था। कुंती भयभीत हो गईं कि परिवार और समाज को क्या उत्तर देंगी। बदनामी से बचने के लिए उन्होंने भारी मन से शिशु को एक टोकरी में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया। यही कारण है कि परिवार को इस घटना की जानकारी नहीं हो सकी। न तो किसी ने जन्म देखा, न कोई प्रमाण बचा। सब कुछ गुप्त रहा।
बाद में यही बालक अधिरथ और राधा को मिला और उनका पालन-पोषण हुआ। आगे चलकर कर्ण महाभारत के महान धनुर्धर और दानवीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि नियति चाहे जितनी भी कठिन हो, व्यक्तित्व अपनी पहचान बना ही लेता है।