Jamai Shashti 2026: आम-लीची, मिठाइयां और तोहफे, ऐसे मनाया जाता है बंगाल का खास पर्व ‘जमाई षष्ठी’

Jamai Shashti: जमाई षष्ठी न केवल एक त्योहार है बल्कि यह रिश्तों को सेलिब्रेट करने का दिन है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में पारिवारिक बंधनों की महत्वता को दर्शाता है।
Jamai Shahsti 2026, significance of jamai shashti in Bengali festival
जमाई षष्ठी 2026 (फोटो. सोशल मीडिया)
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Jamai Shashti 2026: बांग्ला कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की छठी तिथि को जमाई षष्ठी का त्योहार मनाया जाता है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है इस दिन जमाई की सेवा और खातिरदारी की जाती है। साथ ही इस व्रत में बच्चों की अच्छी सेहत के लिए प्रार्थना की जाती है।

इस अनोखी परंपरा का व्यवहारिक महत्व परिवार में संबंधों को मजबूत करना है। इसी के साथ मौसम को ध्यान में रखते हुए बीमारियों से बचने के लिए भी इस व्रत को किया जाता है। इस व्रत में जमाई का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि भारतीय संस्कृति में उन्हें भी बेटे की तरह माना जाता है। यह पर्व इस साल 20 जून यानी शनिवार को मनाया जाएगा।

क्या है इस दिन की खासियत

इस दिन बंगाली समाज में जमाई यानी दामाद को दही का तिलक और आरती करके गृहप्रवेश कराते हैं। इस दिन सास सुबह जल्दी नहाकर षष्ठी देवी की पूजा करती हैं। पूजा के बाद बेटी और दामाद के घर आते ही दोनों की पूजा की जाती हैं। थाली में षष्ठी देवी का जल, दूर्वा, पान का पत्ता, पूजा की सुपारी, मीठा दही, फूल और फल रखे जाते हैं। षष्ठी देवी की पूजा में इस्तेमाल किए गए जल को जमाई और बेटी पर छिड़का जाता है। इसके बाद उनकी आरती होती है। फिर षष्ठी देवी का पीला धागा बांधकर हर तरह की रक्षा और लंबी उम्र की कामना की जाती है।

जमाई के लिए बनते है विशेष पकवान

बंगाल की परंपरा के अनुसार खासतौर से दामाद को मिठाई, आम-लीची सहित मौसमी फल खिलाए जाते हैं। इसके बाद विशेष पकवान खिलाए जाने का रिवाज है, इसमें शाकाहारी से लेकर मांसाहारी तक कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। इस दौरान हाथ पंखे से जमाई को हवा भी की जाती है। इसके बाद जमाई और बेटी को नए कपड़े व तोहफे के साथ विदा किया जाता है। इसके बाद ही मां पानी पीकर अपना व्रत खोलती है।

जमाई षष्ठी 2026 (फोटो.सोशल मीडिया)
जमाई षष्ठी 2026 (फोटो.सोशल मीडिया)

क्या होता है पूजन सामग्री में

गांव की महिलाएं खजूर की डाली काटकर थाली जैसा आकार बनाती हैं और इस थाली का उपयोग पूजा में किया जाता है, जिसमें दूर्वा, धान, करमचा, खजूर के नए पत्ते, पूजा की सुपारी और काला तिल रख जाता हैं। षष्ठी तिथि के दिन सुबह सभी सामग्री हाथों में रखकर नहाकर गीले कपड़े में बच्चों को पंखे से हवा किया जाता है और कामना की जाती है कि संतान पूरी उम्र हर तरह की शारीरिक परेशानियों से दूर रहे।

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