
छेरा पहरा के बिना जगन्नाथ रथ यात्रा है अधूरी (सौ.सोशल मीडिया)
नौ दिवसीय रथ यात्रा 27 जून से शुरू हो रही है। भारत के सबसे प्रमुख और खास त्योहारों में से एक मानी जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा, जिसे ‘रथ त्योहार’ और ‘श्री गुंडीचा यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है।
आपको बता दें, हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को उड़ीसा के पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा बड़ी ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास से निकाली जाती है।
कहते हैं जो रथ यात्रा में शामिल होता है उसके सारे संकट दूर हो जाते हैं। रथ यात्रा के 9 दिन कई तरह की परंपरा निभाई जाती है। पहले दिन छेरा की रस्म की जाती है। ऐसे में आइए जानते हैं क्या है छेरा पहरा ? जगन्नाथ रथ यात्रा इसके बिना है अधूरी, जानें महत्व।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, छेरा पहरा एक प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान है जो रथ यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है। सालों से चली आ रही है छेरा पहरा रस्म में पुरी के गजपति राजा, जो भगवान जगन्नाथ के पहले सेवक माने जाते हैं, सोने की झाड़ू से रथों के आगे रास्ता साफ करते हैं और चंदन मिला जल रास्ते पर छिड़कते हैं।
इस प्रतीकात्मक सफाई का उद्देश्य होता है भगवान के मार्ग को पवित्र करना, इसके बाद ही रथ को खींचा जाता है। ये दर्शाता है कि ईश्वर के आगे राजा और आम जनता सभी एक समान है।
ऐसा माना जाता है कि सोने की झाड़ू से सफाई करके भक्त अपनी भक्ति और समर्पण को व्यक्त करते हैं। इसके जरिए भक्तगण अपनी तरफ से भगवान को सर्वश्रेष्ठ अर्पित करने की इच्छा रखते हैं।
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जैसा कि आप जानते है कि हिन्दू धर्म में सोना सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, यह परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह रथ यात्रा के गौरव और इतिहास को भी दर्शाती है।
आपको बता दें, स्कंद पुराण के अनुसार प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा का रास्ता साफ करने वाला मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति करता है। कहते हैं, इससे व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता का अंत होता है और सुख और समृद्धि भी मिलती है। इसलिए जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान छेरा पहरा को विशेष महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि इस परंपरा के बिना जगन्नाथ रथ यात्रा अधूरी मानी जाती है।






