Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ मंदिर में क्यों लगाया जाता है, खिचड़ी का भोग? जानिए महाप्रसाद की रसोई के चमत्कार
Rath Yatra 2026: पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि श्रद्धा और भक्ति का महाकुंभ है। हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है।
- Written By: रीता राय सागर
जगन्नाथ रथ यात्रा (फोटो.सोशल मीडिया)
Puri Jagannath Rath Yatra 2026: विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरु होने वाली है। उड़ीसा में समुद्र तट के किनारे बसा पुरी शहर अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ अपनी प्राचीन कला के लिए भी जाना जाता है। पुरी भगवान जगन्नाथ का निवास स्थान है।
भगवान जगन्नाथ को श्री विष्णु का 10वां अवतार कहा जाता है। पुराणों में जगन्नाथ धाम को धरती का बैकुंठ यानि स्वर्ग कहा गया है। यह हिन्दू धर्म के चार पवित्र धामों बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम के साथ चौथा धाम माना जाता है।
कैसी है जगन्नाथ मंदिर की संरचना
श्री जगन्नाथ मंदिर का मुख्य मंदिर वक्र रेखीय आकार का है, इसके शिखर पर अष्टधातु से निर्मित विष्णु जी का सुदर्शन चक्र लगा हुआ है, जिसे नीलचक्र भी कहते हैं। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के भी कई मंदिर हैं। जिनमें से मां विमला देवी शक्तिपीठ भी शामिल है। जगन्नाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो सिंह लगे हुए हैं। दर्शन के लिए पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में चार द्वार हैं, जिनके जरिए श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए प्रवेश करते हैं। चारों प्रवेश द्वारों पर हनुमान जी विराजमान हैं, जो सदैव मंदिर की रक्षा करते हैं।
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भगवान जगन्नाथ (फोटो.सोशल मीडिया)
अनोखी है भगवान जगन्नाथ की रसोई
मंदिर में प्रवेश से पहले दाईं तरफ आनंद बाजार और बाईं तरफ महाप्रभु की विशालकाय और पवित्र रसोई है। इस रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तनों को एक दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है। लेकिन कहा जाता है कि इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान सबसे पहले पककर तैयार होता है, फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद बनता है।
मंदिर में इस प्रसाद को सबसे पहले भगवान जगन्नाथ को अर्पित किया जाता है और फिर भक्तों को। इस प्रसाद को रोजाना करीब 25000 से अधिक लोग ग्रहण करते हैं। हैरानी की बात यह है कि यहां न तो प्रसाद बचता है और न ही कभी कम पड़ता है।
जगन्नाथ पुरी (फोटो.सोशल मीडिया)
प्रभु को खिचड़ी का ही भोग क्यों लगाया जाता है
श्री जगन्नाथ मंदिर में प्रात:काल जगन्नाथजी को खिचड़ी का बाल भोग लगाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में भगवान की एक परम भक्त थी कर्माबाई। वे जगन्नाथ पुरी में रहती थीं और भगवान से अपने पुत्र की तरह स्नेह करती थी। कर्मा बाई एक पुत्र के रूप में ठाकुरजी के बाल रूप की उपासना करती थीं। एक दिन कर्मा बाई की इच्छा हुई कि ठाकुरजी को फल-मेवे की जगह अपने हाथों से कुछ बना कर खिलाऊं।
उन्होंने प्रभु को अपनी इच्छा के बारे में बताया। तो प्रभुजी बोले, मां, जो भी बनाया हो वही खिला दो, बहुत भूख लग रही है। कर्मा बाई ने खिचड़ी बनाई थी और ठाकुर जी को बड़े चाव से खिचड़ी खाने को दे दी। प्रभु बड़े प्रेम से खिचड़ी खाने लगे और कर्मा बाई यह सोचकर भगवान को पंखा झलने लगीं कि कहीं गर्म खिचड़ी से मेरे प्रभु का मुंह न जल जाए। प्रभु बड़े चाव से खिचड़ी खा रहे थे और मां की तरह कर्मा उनका दुलार कर रही थी।
भगवान ने कहा, मां मुझे तो खिचड़ी बहुत अच्छी लगी। मेरे लिए आप रोज खिचड़ी ही बनाना। अब कर्माबाई रोज बिना स्नान के ही प्रातःकाल ठाकुरजी के लिए खिचड़ी बनाती थीं। कथानुसार ठाकुरजी स्वयं बालरूप में कर्माबाई की खिचड़ी खाने के लिए आते थे। लेकिन एक दिन कर्माबाई के घर एक साधु मेहमान आए। जब उन्होंने देखा कि कर्माबाई बिना स्नान किए ही खिचड़ी बनाकर ठाकुरजी को भोग लगा देती हैं, तो उसने उन्हें ऐसा करने से मना किया।
जगन्नाथ पुरी (फोटो.सोशल मीडिया)
अगले दिन कर्माबाई ने इन नियमों के अनुसार ठाकुरजी के लिए खिचड़ी बनाई जिससे उन्हें खिचड़ी बनाने में देर हो गई। ठाकुर जी जब खिचड़ी खाकर मंदिर पहुंचे, तो मंदिर में दोपहर के भोग का समय हो गया और ठाकुरजी जूठे मुंह ही मंदिर पहुंच गए और वहां पुजारियों ने देखा कि ठाकुरजी के मुंह पर खिचड़ी लगी हुई है, तब पूछने पर ठाकुरजी ने सारी कथा उन्हें बताई। जब यह बात साधु को पता चली तो वह बहुत पछताया और उसने कर्माबाई से क्षमा-याचना करते हुए उसे पूर्व की तरह बिना स्नान किए ही ठाकुरजी के लिए खिचड़ी बनाकर ठाकुरजी को खिलाने को कहा। इसलिए आज भी पुरी के जगन्नाथ मंदिर में प्रात:काल बालभोग में खिचड़ी का ही भोग लगाया जाता है।
