होलिका दहन (सौ.सोशल मीडिया)
Bhadra Kaal: होली से महज एक दिन पहले होलिका दहन का पर्व मनाया जाता हैं। जो कि इस बार 3 मार्च को मनाया जाएगा और अगले दिन 4 मार्च को धुलेंडी पर रंगों का त्योहार मनाया जाएगा। सनातन धर्म में होलिका दहन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन के समय भद्र काल का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भद्र काल में होलिका दहन करना वर्जित माना गया है।
इस वर्ष पंचांग के अनुसार, भद्र काल: 03 मार्च को सुबह 01:25 बजे से 04:30 बजे तक। इसलिए भद्र समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करना शुभ रहेगा।
ज्योतिष शास्त्र में भद्रा को अशुभ काल माना गया है। यह समय चंद्रमा की स्थिति के अनुसार बनता है। शास्त्रों में कहा गया है कि भद्रा में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे कार्य में बाधा, नुकसान या अनिष्ट की आशंका बढ़ जाती है।
धार्मिक एवं लोक मान्यता के अनुसार, भद्रा काल को उग्र और अशुभ माना गया है। इस समय किया गया कोई भी शुभ कार्य अपने सकारात्मक परिणाम नहीं देता।
पौराणिक कथा कहती है कि होलिका दहन भी तभी सफल और शुभ हुआ था जब इसे शुभ मुहूर्त में किया गया। इसी परंपरा का आज भी पालन किया जाता है।
यदि भद्रा में होलिका दहन किया जाए, तो माना जाता है कि इससे घर में अशांति, विवाद और आर्थिक हानि हो सकती है। इसलिए पंडित और ज्योतिषाचार्य हमेशा भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करने की सलाह देते हैं।
इस समय केवल पूजा की तैयारी करें।
भगवान विष्णु और भगवान शिव का ध्यान करें।
घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने के लिए गायत्री मंत्र का जाप करें।
भद्रा समाप्त होने के बाद ही विधि-विधान से होलिका पूजन और दहन करें।
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होलिका दहन की कथा प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप से जुड़ी है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और भक्ति की हमेशा जीत होती है।
सही मुहूर्त में होलिका दहन करने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सकारात्मकता बनी रहती है।