Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Control of The Senses: श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि जिसने अपने हृदय में दिव्य युगल का आश्रय ले लिया, उसके लिए जीवन का एक ही संकल्प होना चाहिए “नन्याम बादामी”, यानी मैं उनके अलावा कुछ नहीं बोलूंगा। उनके अनुसार, एक साधक को केवल प्रिय-प्रितम की महिमा, नाम, धाम और रसिक संतों की संगति की ही चर्चा करनी चाहिए। यदि जीभ ईश्वर से इतर विषयों में लिप्त रहती है, तो बाकी इंद्रियों को वश में करना असंभव हो जाता है। जब वाणी अशुद्ध होती है, तो स्वाद भी अपवित्र हो जाता है और अंततः कामेंद्रिय मनुष्य को अपना गुलाम बना लेती है, जिससे पतन निश्चित हो जाता है।
इंद्रियां वे द्वार हैं, जिनसे संसार भीतर प्रवेश करता है। इसलिए इनकी रक्षा अत्यंत आवश्यक है।
श्री प्रेमानंद जी महाराज निष्ठा की शक्ति पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि वृंदावन धाम में रहकर उन्होंने ऐसे चमत्कार देखे हैं, जो चिकित्सा विज्ञान से परे हैं। केवल “राधा राधा” नाम जप और धाम के आश्रय से असाध्य रोग तक मिटते देखे गए हैं। समस्या यह है कि हमारा आश्रय बंटा हुआ है कभी पैसा, कभी पद, कभी रिश्ते। सच्चा आश्रय वही है, जहां सुख-दुख दोनों में प्रभु को ही कर्ता माना जाए।
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भक्ति का अंतिम फल सांसारिक लाभ नहीं, बल्कि वह प्रेम है जो आंखों से बहने लगता है। वृक्ष के नीचे बैठकर “राधा राधा” कहते हुए धरती को अपने आंसुओं से भिगो देना यही सच्ची पूजा है। भगवान उन्हीं को प्रकट होते हैं, जो उनके लिए रोते हैं। नाम ही कल्पवृक्ष है, जो इस लोक और परलोक दोनों का कल्याण करता है।