देवउठनी एकादशी को इस कथा का जरूर करें पाठ, श्रीहरि विष्णु की बनी रहेगी साल भर कृपा
Ekadashi Katha: देवउठनी एकादशी का व्रत सच्चे मन करने से श्री हरि भगवान विष्णु जी की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही व्रत कथा का पाठ करने से जीवन खुशहाल होता है। आइए पढ़ते हैं देवउठनी एकादशी की व्रत कथा ..
- Written By: सीमा कुमारी
देवउठनी एकादशी की व्रत कथा (सौ.सोशल मीडिया)
Dev Uthani Ekadashi 2025 Katha: हर साल कार्तिक महीने में मनाई जाने वाली एकादशी यानी देवउठनी एकादशी सनातन धर्म में विशेष महत्व रखती है। यह एकादशी सभी एकादशी तिथि से बड़ी एवं महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस शुभ तिथि पर भगवान विष्णु चार महीने के योग निद्रा से जागते हैं और संसार का कार्यभार संभालते हैं। जिसके बाद से सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।
मान्यता है कि देवउठनी एकादशी का व्रत सच्चे मन करने से श्री हरि भगवान विष्णु जी की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही व्रत कथा का पाठ करने से जीवन खुशहाल होता है। आइए पढ़ते हैं देवउठनी एकादशी की व्रत कथा-
देवउठनी एकादशी पर करें इस कथा का पाठ
पौराणिक कथा के अनुसार, किसी समय की बात है कि एक राजा के राज्य में सभी एकादशी का व्रत करते थे। व्रत के दौरान पूरे राज्य में किसी को अन्न नहीं दिया जाता था। एक बार ऐसा समय आया कि एक दिन एक व्यक्ति नौकरी मांगने के लिए राजा के दरबार में आया। उसकी बातें सुनने के बाद राजा ने कहा कि नौकरी तो मिल जाएगी, लेकिन एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाएगा। नौकरी मिलने की खुशी में उस व्यक्ति ने राजा की बात मान ली।
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एकादशी का व्रत आया। सभी ने विधिपूर्वक व्रत किया। साथ ही उसने भी फलाहार किया, लेकिन भूख नहीं मिटी। वह राजा के पास अन्न मांगने के लिए गया। उसने राजा से कहा कि फलाहार से उनकी भूख नहीं मिटी है, वह भूखों मर जाएगा। उसे खाने के लिए अन्न दिया जाए। इस पर राजा ने अपनी शर्त वाली बात दोहराई।
उस व्यक्ति ने कहा कि वह भूख से मर जाएगा, उसे अन्न की आवश्यकता है। तब राजा ने उसे भोजन के लिए आटा, दाल, चावल दिलवा दिया। इसके बाद वह नदी के किनारे स्नान किया और भोजन बनाया। उसने भोजन निकाला और भगवान को निमंत्रण दिया। तब भगवान विष्णु वहां आए और भोजन किए। फिर चले गए। वह भी अपने काम में लग गया।
फिर दूसरे मास की एकादशी आई। इस बार उसने अधिक अनाज मांगा। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि पिछली बार भगवान भोजन कर लिए, इससे वह भूखा रह गया। इतने अनाज से दोनों का पेट नहीं भरता। राजा चकित थे, उनको उस व्यक्ति की बात पर विश्वास नहीं हुआ। तब वह राजा को अपने साथ लेकर गया।
उसने स्नान करके भोजन बनाया और भगवान को निमंत्रण दिया। लेकिन इस बार भगवान नहीं आए। वह शाम तक भगवान का इंतजार करता रहा। राजा पेड़ के पीछे छिपकर सब देख रहे थे। अंत में उसने कहा कि हे भगवान! यदि आप भोजन करने नहीं आएंगे तो नदी में कूदकर जान दे देगा। भगवान के न आने पर उस नदी की ओर जाने लग, तब भगवान प्रकट हुए। उन्होंने भोजन किया। फिर उस पर भगवत कृपा हुई और वह प्रभु के साथ उनके धाम चला गया।
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राजा को ज्ञान हो गया कि भगवान को भक्ति का आडंबर नहीं चाहिए। वे सच्ची भावना से प्रसन्न होते हैं और दर्शन देते हैं। इसके बाद से राजा भी सच्चे मन से एकादशी का व्रत करने लगे। अंतिम समय में उनको भी स्वर्ग की प्राप्ति हो गई।
