Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Radha Naam Mahima: प्रेमानंद जी महाराज बताते है कि इस मानव जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य उस परम सत्ता से सच्चा प्रेम करना है, जिसे हम Radha-श्याम, वाहेगुरु या ईश्वर कहते हैं। कई लोग पूछते हैं कि सच्चा प्रेम कैसे पहचाना जाए? इसका सरल उत्तर है अगर तुम प्रभु से झूठा प्रेम भी करोगे, तो भी मंगल होगा। “प्रभु, मैं केवल आपका हूँ” यह भाव भले शुरुआत में कृत्रिम लगे, लेकिन धीरे-धीरे यही भावना सच्चे प्रेम में बदल जाती है।
महाराज जी बताते है कि आध्यात्मिक जीवन में दो चीजें बेहद जरूरी हैं भगवान का स्मरण और उनका आश्रय। बिना नाम जप के केवल आश्रय की बात करना अधूरा है। ‘राधा’ नाम को परा विद्या कहा गया है। एक बार “राधा” का उच्चारण करने से भी एक श्वास सार्थक हो जाती है। याद रखिए, जिसकी जुबान पर भगवान का नाम होता है, उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश और बाहर आनंद का वैभव होता है।
हर साधक को अपने मन से संघर्ष करना पड़ता है। पुराने संस्कार और बुरी आदतें बार-बार आपको भटकाने की कोशिश करती हैं। ऐसे समय में धैर्य रखना ही असली तपस्या है। मन चाहे जितना डराए या बहकाए, संकल्प यही होना चाहिए: “मर जाऊँगा पर बुरा आचरण नहीं करूँगा” ध्यान रखें, जब तक विकार केवल मन में हैं, तब तक डरने की जरूरत नहीं है, बस उन्हें कर्म में न बदलने दें।
सच्चा प्रेम वही है जिसमें सांसारिक दुख आपको विचलित नहीं करता। जिसका संबंध परमात्मा से जुड़ जाता है, वह हर परिस्थिति में स्थिर रहता है। जैसे मीरा बाई ने केवल गिरधर गोपाल को ही अपना सब कुछ माना और जीवन की कठिनाइयों में भी अडिग रहीं। अगर आप सच्चे मन से कह दें “नाथ, मैं आपकी शरण में हूँ”, तो ईश्वर स्वयं आपकी रक्षा करते हैं।
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जीवन की समस्याओं का हल इंसानों में नहीं, बल्कि भगवान में ढूंढें। नाम की डोरी को थामे रखें। अगर आप नाम का स्मरण करते रहेंगे, तो प्रभु स्वयं आपकी ओर खिंचे चले आएंगे।