नवभारत विशेष: कार्पोरेट जगत में मजहबी कट्टरता क्यों? इसके तार बहुत दूर तक फैले हैं
Nida Khan Case: निदा खान से जुड़े धर्म परिवर्तन और मजहबी कट्टरता के आरोपों को लेकर बहस तेज है। मामला धार्मिक सद्भाव, कट्टरता और सामाजिक तनाव पर सवाल खड़े कर रहा है।
- Written By: अंकिता पटेल
निदा खान,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Religious Conversion Controversy India: पहले पहलगाम में आतंकियों द्वारा धर्म पूछकर किया गया कत्लेआम, फिर मुंबई में यह कहकर कि कुरान की फलां आयत सुनाओ और कलमा न पढ़ पाने पर किया गया हमला और अब निदा खान द्वारा मजहबी कट्टरता का धर्म परिवर्तन कांड आखिर ये कौन से आतंकी मंडिल हैं, जिन्हें लगातार भारत झेल रहा है? निदा खान अकेली महिला जो एक ऐसी कंपनी में कार्यरत है। जिसके नियम-कानून बहुत सख्त हैं, वहां पर इस तरह का शोषण क्या बिना किसी इशारे पर हो सकता है? निदा मजहबी कट्टरता की नई सनसनी बन गई है। जिसने धार्मिक सद्भाव को खत्म करने के लिए जो काम किया है, वह मौत से भी अधिक खतरनाक है जिसके लिए पाकिस्तानी आतंकवादी दिन रात लगे रहते हैं।
इस्लाम के नाम पर जिस तरह से धार्मिक आयतें या इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए लिंक शेयर किए गए वह किस पैटर्न का हिस्सा हैं? यह पैटर्न तो पाकिस्तान की वह खुफिया एजेंसियां करती हैं, जो पहलगाम में धर्म पूछकर मारने के लिए जिम्मेदार हैं। जब आपेरशन सिंदूर ने काफी कुछ समाप्त कर दिया है, तो क्या अब आतंक के लिए यह नया रास्ता निकाला जा रहा है? यह भारत ही नहीं पूरी दुनिया के आई टी सेक्टर के साथ ही हर सेक्टर के लिए खतरनाक है, जरूरत इस बात की है कि इस मामले में पूरी सच्चाई सामने आए अन्यथा यह मामला भी नौकरी दिलाने के नाम पर ईसाई बनाने जैसी चेन तैयार करने का एक मार्ग बनेगा। टीसीएस जैसी न जाने भारत में कितनी कंपनियां हैं, जहां बताया जा रहा है कि टीसीएस में आधा दर्जन से ऊपर महिलाओं का सेक्सुअल हैरेसमेंट किया गया, उनको धर्म परिवर्तन के लिए धमकाया गया और वह सभी काम
करने के लिए मजबूर किया गया, जिसके लिए पाकिस्तान की मजहबी कट्टरता पहचानी जाती है। अब निदा पुलिस के फंदे में आ चुकी है और अपनी करतूतों को छिपाने के लिए बहानेबाजी के रास्ते निकाल रही है। मगर अब भारत में ही नहीं दुनिया के उन सभी देशों में इस बात पर चिंता व्यक्त की जा रही है, जिसमें टीसीएस या उस जैसी कंपनियों में भारतीय कामगार हैं।
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पाकिस्तान यह समझ चुका है कि वह भारत से किसी भी हालत में लड़ नहीं सकता, वह निदा जैसों के जरिये अपनी करतूत को अंजाम तो नहीं दे रहा? कहने वाले इसे मलेशिया से भी कनेक्ट कर रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फ्लिपकार्ट या इनके समकक्ष दूसरी मल्टीनेशनल कंपनियों में इस समय जितनी स्ट्रेंथ भारतीयों की है, शायद उतनी किसी दूसरे देश के नागरिकों की नहीं है और भारतीय धर्म के प्रति जितने लिबरल होते हैं उतने दूसरे देशों के नहीं। संभवतः टाटा जैसी कंपनी में यह कांड इसी वजह से हुआ है। कहा जा रहा है कि इससे पहले भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं।
इसके तार बहुत दूर तक फैले हैं
निदा खान ने समाज की स्थिति क्या कर दी है? यह उस निदा से भी जाना जा सकता है जो वर्ष 2016 में तीन तलाक के मामले में सामने आई थी। सोशल मीडिया पर पति द्वारा दिए गए तलाक के बाद उसने तीन तलाक पर प्रश्न चिन्ह लगाया था और बरेली के एक मौलवी ने उस पर फतवा जारी किया था। तब निदा ने कहा था कि वह महिला अधिकारों की बात करती है।
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उस वक्त निदा की उन सभी ने तारीफ की थी, जो इस तीन तलाक बुराई के खिलाफ थे और अब यह दूसरी निदा है, जिसने महिला अधिकारों के स्थान पर महिलाओं का ही शोषण करने का प्रयास किया है। कितना आचर्य होता है कि एक निदा इंसाफ के लिए लड़ती है और बाद में उसी राह में तीन तलाक कानून बनता है और एक दूसरी निदा ने जिसने बेरोजगारी के दौर में प्राइवेट सेक्टर में भी धर्म के नाम पर रोजगारों पर कुठाराघात किया है।
लेख- मनोज वाष्र्णय के द्वारा
