Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Gemini)
Importance of Name Chanting: हर इंसान सुख चाहता है, लेकिन जीवन में परेशानियाँ, तनाव और अचानक आई विपत्तियाँ क्यों घेर लेती हैं? Shri Premanand Ji Maharaj के अनुसार, इसका कारण बाहरी दुनिया नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपी कमजोरियाँ हैं। जीवन एक अनमोल अवसर है, लेकिन जब मनुष्य इसे केवल धन, भोग और स्वार्थ में गंवा देता है, तब विपत्तियाँ उसका पीछा नहीं छोड़तीं। हनुमान जी ने भी स्पष्ट कहा है सबसे बड़ी विपत्ति वही है जब मनुष्य प्रभु के सुमिरन से दूर हो जाए।
जो व्यक्ति नाम जप और भक्ति से विमुख होकर केवल स्वार्थ में डूबा रहता है, उसके जीवन में शांति नहीं टिकती। बिना प्रभु स्मरण के सुख स्थायी नहीं होता।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर ये छह विकार भीतर के “शैतान” हैं। जो इनके अधीन हो जाता है, वह मानसिक और शारीरिक कष्टों से घिर जाता है।
मनुष्य बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगा है, लेकिन मृत्यु के सत्य को भूल जाता है। हर श्वास घट रही है, पर तैयारी शून्य है यही असली संकट है।
ईश्वर को छोड़कर दुनिया को खुश करने में जीवन खपा देना भी विपत्ति का कारण है। समाज की प्रशंसा के पीछे भागना अंततः खालीपन देता है।
राजसिक और तामसिक भोजन तथा नकारात्मक चर्चाएँ बुद्धि को दूषित करती हैं। जैसा अन्न और संग, वैसा मन।
आज लोग अपने विकारों को सही ठहराते हैं और दूसरों की निंदा करते हैं। जो स्वयं को सुधारने के बजाय दोषों का बचाव करता है, उसकी दुर्गति तय है।
Shri Premanand Ji Maharaj कहते हैं निरंतर नाम जप करें और भगवान से कोई सौदा न करें। निष्काम भजन करने पर प्रभु स्वयं आपकी चिंता करते हैं, जैसे माँ अपने बच्चे की। हर श्वास अनमोल है, इसे व्यर्थ बातों में न गंवाएँ। सात्विक भोजन करें, भूख से थोड़ा कम खाएँ और एकांत में ईश्वर का चिंतन करें।
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• माता-पिता की सेवा को भगवान की सेवा मानें, चाहे वे कठोर ही क्यों न हों।
• अधर्म या घूस से कमाया धन परिवार को भीतर से खोखला कर देता है।
• भगवान से “contract” न करें वे सर्वज्ञ हैं, उन्हें प्रलोभन नहीं, सच्चा समर्पण चाहिए।
जो मान-अपमान, लाभ-हानि और सुख-दुःख में समान रहे, वही सच्चा भक्त है। यदि भीतर अहंकार है कि “मैं बड़ा भक्त हूँ”, तो समझिए कृपा अभी दूर है। सच्चा प्रेमी स्वयं को दीन ही मानता है। अंततः संसार बंधन देता है, लेकिन नाम जप “राधा-राधा” मुक्ति का मार्ग खोलता है। अपने कर्मों को भगवान को अर्पित कर दें, तभी जीवन की विपत्तियाँ दूर होंगी।