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पितामह भीष्म ने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति ही क्यों चुना? जानिए उत्तरायण में मृत्यु का महत्व

Religious Beliefs: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति या उत्तरायण में देहांत होने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति होती है, इसलिए इस काल में मृत्यु को मोक्ष की ओर ले जाने वाला मार्ग होता है।

  • By सीमा कुमारी
Updated On: Jan 09, 2026 | 06:57 PM

पितामह भीष्म और मकर संक्रांति का संबंध(सौ.सोशल मीडिया)

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Bhishma Pitamah Makara Sankranti : भगवान सूर्य देव को समर्पित मकर संक्रांति का पावन त्योहार आने वाला है। यह त्योहार हर साल पौष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन से खरमास खत्म होता है और शुभ व मांगलिक कार्यों जैसे शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि की शुरुआत होती है।

इस बार 14 जनवरी, दिन बुधवार को पूरे देशभर में मनाया जाएगा। मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक प्रमुख और विशेष पर्व है। नए साल पर मकर संक्रांति हिंदू धर्म का पहला त्योहार होता है।

मकर संक्रांति सिर्फ एक पर्व नहीं है, बल्कि अध्यात्मिक दृष्टि से भी इसके कई विशेष पहलू हैं। इस दिन मकर राशि में सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं।

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शास्त्रों में इसको देवताओं का काल माना गया है। बताया जाता है कि सूर्य देव जब उत्तरायण होते हैं, तो स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं।

लोक मान्यताएं हैं कि उत्तरायण में मरने वालों को मोक्ष मिलता है, जबकि दक्षिणायन के सूर्य में मृत्यु होने वालों को जन्म-मरण के चक्र से गुजरना होता है।

जैसा कि सभी जानते है कि, तीज-त्योहारों पर मृत्यु हो जाने पर लोगों में भ्रम की स्थिति देखी जाती है। कई बार लोगों के मन में ये सवाल भी उठता है कि अगर मकर संक्रांति के दिन किसी के मृत्यु हो जाती है, तो इसके मायने क्या हैं?

उत्तरायण काल क्यों माना जाता है मृत्यु के लिए शुभ

शास्त्रों में दक्षिणायन को साधारण और उत्तरायण को विशेष आध्यात्मिक काल माना गया है। उत्तरायण को देवयान कहा जाता है, यानी वह मार्ग जिससे आत्मा उच्च लोकों की ओर अग्रसर होती है। इसी कारण उत्तरायण के दौरान दान, जप, तप और शरीर त्याग को पुण्यदायी बताया गया है। हालांकि शास्त्र यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल तिथि नहीं, बल्कि व्यक्ति के कर्म, भक्ति और ज्ञान ही मोक्ष का वास्तविक आधार होते हैं।

पितामह भीष्म और मकर संक्रांति का संबंध

महाभारत की कथा में पितामह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। युद्ध के दौरान वे अर्जुन के बाणों से घायल होकर शरशय्या पर पड़े रहे, लेकिन उन्होंने प्राण त्याग नहीं किया। उस समय सूर्य दक्षिणायन में थे, जिसे वे प्राण त्याग के लिए अनुकूल नहीं मानते थे। भीष्म ने कष्ट सहते हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और मकर संक्रांति के दिन ही अपने प्राण त्यागे। यही कारण है कि यह दिन परमगति और मोक्ष से जोड़ा जाता है।

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क्या केवल इस दिन मृत्यु से मोक्ष मिल जाता है?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मकर संक्रांति पर मृत्यु को शुभ माना जाता है, लेकिन मोक्ष केवल तिथि से नहीं मिलता। धर्म, सत्य, सेवा और सद्कर्म ही आत्मा को परमगति तक पहुंचाते हैं। भीष्म को मोक्ष उनके जीवन भर के त्याग, ब्रह्मचर्य और धर्मनिष्ठा के कारण प्राप्त हुआ।

Bhishma chose makar sankranti for death uttarayana

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Published On: Jan 09, 2026 | 06:57 PM

Topics:  

  • Makar Sankranti
  • Religion
  • Sanatana Dharma

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