बसंत पंचमी के दिन यहां बंगाली समाज मनाता है ये अनोखी परंपरा, 1929 में हुई थी इसकी शुरुआत
सबसे खास त्योहारों में से एक बसंत पंचमी का त्योहार 2 फरवरी को मनाया जाने वाला है।इसकी कई परंपराएं मौजूद है इसमें ही खास परंपरा बंगाली समाज द्वारा निभाई जाती है। इसे बंगाली समाज में 'हाथेखड़ी' की अनोखी परंपरा के रूप में जा
- Written By: दीपिका पाल
बसंत पंचमी पर हाथेखड़ी अनोखी परंपरा (सौ.सोशल मीडिया)
Basant Panchami 2025: हिंदू धर्म में कई व्रत और त्योहार का महत्व है इसमें ही सबसे खास त्योहारों में से एक बसंत पंचमी का त्योहार 2 फरवरी को मनाया जाने वाला है। यह त्योहार हिंदू संवत्सर के माघ महीने में उत्सव के रूप में मनाया जाता है इस दौरान मौसम में बदलाव होता है। यानि यहां पर गुजर रही ठंड और गर्मी की शुरुआत के बीच के इस मौसम को बसंत पंचमी कहते है।
बसंत पंचमी का त्योहार हर किसी के लिए खास होता है तो वहीं पर इसकी कई परंपराएं मौजूद है इसमें ही खास परंपरा बंगाली समाज द्वारा निभाई जाती है। इसे बंगाली समाज में ‘हाथेखड़ी’ की अनोखी परंपरा के रूप में जानते है।
90 साल से चली आ रही है परंपरा
बसंत पंचमी पर मनाई जाने वाली यह परंपरा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रचलित है जो सबसे व्यस्ततम चौराहे पर स्थित कालीबाड़ी मंदिर में मनाई जाती है। इसकी शुरुआत 1929 में मंदिर की स्थापना के साथ शुरु हुई थी जिसे बंगाल समाज ने ‘हाथेखड़ी’ की परंपरा का नाम दिया है। इस शब्द को समझें तो, हाथेखड़ी का हिंदी में मतलब होता है हाथ से लिखकर अक्षर ज्ञान देने की शुरुआत।
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इसमें छोटे बच्चे को पहली बार स्लेट-पट्टी पर सफेद चाक से अक्षर लिखना सिखाया जाता है। वहीं पर इस परंपरा में जिन बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान दिया जाना है, उन्हें तिलक लगाकर उनसे भी मां सरस्वती की आराधना करवाई जाती है। इसके बाद पंडित, शिक्षक अथवा अभिभावक बच्चों को पहला अक्षर ‘अ’ लिखना सिखाते हैं।
मां सरस्वती के इन 12 नामों का करवाते है उच्चारण
आपको बताते चलें कि, इस परंपरा में खास तौर से बच्चों को अक्षर ज्ञान देने से पहले मां सरस्वती के 12 नामों का उच्चारण करवाया जाता है। इन 12 नामों में मां भारती, मां सरस्वती, मां शारदा, मां हंसवाहिनी, मां जगती, मां वागीश्वरी, मां कुमुदी, मां ब्रहचारिणी, मां बुद्घिदात्री, मां वरदायिनी, मां चंद्रकांति और मां भुवनेश्वरी के नामों का जाप करवाया जाता है। जहां पर नाम का जाप करने से बच्चों की शिक्षा और विकास में मदद मिलती है।
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क्या है इस परंपरा का उद्देश्य
यहां पर इस परंपरा को निभाने का मुख्य उद्देश्य छोटे बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने से होता है। पुजारी मां सरस्वती की विशेष आराधना करके आह्वान करते हैं। जिन बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान दिया जाना है, उन्हें तिलक लगाकर उनसे भी मां सरस्वती की आराधना करवाई जाती है। इसके बाद पंडित, शिक्षक अथवा अभिभावक बच्चों को पहला अक्षर ‘अ’ लिखना सिखाते हैं।
सभी बच्चे कॉपी, पुस्तक, पेंसिल, स्लेट की पूजा करते हैं। वहीं पर परंपरा के अनुसार, स्कूल जाने लायक बच्चों के लिए हाथेखड़ी का आयोजन करते हैं, वहीं दूसरे समाज के लोग मां का दूध पी रहे बच्चे को इसी दिन पहली बार खीर का भोग लगाकर बच्चे को पहला अन्न खिलाने की परंपरा निभाने भी आते हैं। बच्चे को नए कपड़े पहनाकर, चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर और उस पर बच्चे को बिठाकर मां सरस्वती की आराधना करके चांदी के चम्मच से खीर खिलाते हैं।
