

Solah Shringar: भारतीय संस्कृति में महिलाओं के श्रृंगार का अलग से वर्णन है। हर तीज-त्योहार में महिलाएं कई प्रकार के श्रृंगार करती हैं, जिसका संबंध न केवल खूबसूरती बल्कि उनके स्वास्थ्य और परंपरा दोनों से जुड़ा है। खासतौर पर विवाहित महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार को सौभाग्य, वैवाहिक जीवन और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
हरियाली तीज, करवा चौथ और विवाह जैसे अवसरों पर महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसकी सूची में कुछ अंतर भी होता है।
सोलह श्रृंगार का अर्थ महिलाओं द्वारा किए जाने वाले उन पारंपरिक श्रृंगार से है, जिनमें मेकअप, सुगंध और आभूषण शामिल होते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इन्हें सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना गया है। हरियाली तीज जैसे पर्व पर महिलाएं विशेष रूप से सजती-संवरती हैं और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
विवाहित महिलाओं के लिए सिंदूर को प्रमुख सुहाग चिह्न माना जाता है। इसे वैवाहिक जीवन और पति-पत्नी के रिश्ते से जोड़ा जाता है। यह पति-पत्नी के बीच के संबंधों की खूबसूरती बयां करता है।
माथे पर लगाई जाने वाली बिंदी सोलह श्रृंगार का अहम हिस्सा मानी जाती है। धार्मिक परंपराओं में इसे शुभता और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ा जाता है।
काजल आंखों की खूबसूरती बढ़ाने वाला पारंपरिक श्रृंगार है। कई लोक मान्यताओं में इसे बुरी नजर से बचाव से भी जोड़ा गया है।
हाथ-पैरों पर मेहंदी लगाना भारतीय विवाह और त्योहारों की पुरानी परंपरा है। खासकर तीज और शादी के अवसर पर इसका विशेष महत्व माना जाता है।
पारंपरिक साड़ी, लहंगा या अन्य विशेष परिधान भी सोलह श्रृंगार का हिस्सा माने जाते हैं। अलग-अलग राज्यों में शुभ रंग और पहनावे की परंपरा अलग-अलग होती है।
फूलों से बना गजरा बालों में लगाया जाता है। इसकी खुशबू और सुंदरता पारंपरिक स्त्री श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पुराने जमाने में खुशबू के लिए गजरा, इत्र व धूप का ही इस्तेमाल किया जाता था।
मांग के बीच पहना जाने वाला मांग टीका माथे और बालों की सुंदरता को निखारता है। इसे पारंपरिक रूप से सौभाग्य और गरिमा से जोड़ा जाता है।
नाक में पहना जाने वाला नथ या नोज रिंग विवाह और त्योहारों में खास तौर पर पहना जाता है। कई परंपराओं में इसे देवी पार्वती और सुहाग से जोड़ा गया है।
कान में पहने जाने वाले झुमके या कर्णफूल महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों में शामिल हैं। इनका उल्लेख सोलह श्रृंगार की विभिन्न सूचियों में मिलता है।
गले का हार और विशेष रूप से मंगलसूत्र विवाहित महिलाओं के प्रमुख आभूषणों में से एक माना जाता है। कई भारतीय परंपराओं में मंगलसूत्र को वैवाहिक बंधन का प्रतीक माना जाता है।
बांह पर पहना जाने वाला बाजूबंद पारंपरिक आभूषण है। पुराने समय में इसे महिलाओं के श्रृंगार और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता था।
चूड़ियों की खनक भारतीय स्त्री श्रृंगार की पहचान मानी जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में चूड़ियों के रंग और डिजाइन का अलग सांस्कृतिक महत्व है।
अंगूठी को प्रेम, रिश्ते और प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। विवाह या सगाई के दौरान अंगूठी पहनाने की परंपरा भी काफी प्रचलित है।
कमर में पहना जाने वाला कमरबंद पारंपरिक भारतीय आभूषण है। यह खासकर दुल्हन के श्रृंगार में आकर्षण बढ़ाता है और कई परंपराओं में इसे गृहस्थ जीवन से जोड़ा गया है।
पैरों की उंगलियों में पहनी जाने वाली बिछिया मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों में शामिल है। भारतीय संस्कृति के कई हिस्सों में इसे सुहाग का प्रतीक माना जाता है।
पैरों में पहनी जाने वाली पायल सोलह श्रृंगार का अंतिम प्रमुख हिस्सा मानी जाती है। इसकी छनक पारंपरिक भारतीय स्त्री श्रृंगार की खास पहचान रही है।
धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं में सोलह श्रृंगार को सौंदर्य, सौभाग्य, समृद्धि और वैवाहिक मंगल से जोड़ा जाता है। विशेष रूप से तीज जैसे पर्व पर महिलाएं सजने-संवरने के साथ देवी पार्वती की पूजा करती हैं और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।