PHOTO: क्या आप भी जरूरत से ज्यादा सोचते हैं? ये 8 संकेत बिल्कुल नजरअंदाज न करें
Overthinking 8 Warning Signs: क्या आप भी हर छोटी-छोटी बात को जरूरत से ज्यादा सोचते हैं? जानिए ज्यादा सोचने के 8 संकेत, जो आपकी मानसिक सेहत पर असर डाल सकते हैं।
- Written By: वंदना शर्मा
क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि कोई छोटी-सी बात आपके दिमाग में आती है और फिर घंटों तक वहीं घूमती रहती है? किसी की एक बात, एक मैसेज, एक छोटी-सी गलती या फिर आने वाले कल की चिंता... सब कुछ बार-बार दिमाग में चलता रहता है। धीरे-धीरे ये आदत इतनी बढ़ जाती है कि मन शांत ही नहीं होता। अगर आपको भी लगता है कि आपका दिमाग बिना वजह हर समय कुछ न कुछ सोचता रहता है, तो हो सकता है कि आप Overthinking की आदत से जूझ रहे हों। आइए जानते हैं ऐसे 8 संकेत, जो बताते हैं कि कहीं आपका दिमाग जरूरत से ज्यादा तो नहीं सोच रहा।
मान लीजिए ऑफिस में किसी ने आपसे कहा कि किसी जरूरी काम पर बाद में बात करेंगे। इसके बाद आपका दिमाग उसी बात को बार-बार अलग-अलग तरीके से सोचने लगता है। आप उस घटना को बार-बार याद करते हैं और मन में कई तरह के अनुमान लगाने लगते हैं, जबकि सच्चाई क्या है, यह अभी पता भी नहीं होता है और अगर किसी एक बात को आप बार-बार सोचते रहते हैं और चाहकर भी उससे बाहर नहीं निकल पाते, तो यह ज़्यादा चिंता करने का सबसे आम संकेत हो सकता है। सोचने और जरूरत से ज्यादा सोचने में फर्क यही है कि पहला समाधान ढूंढ़ता है, जबकि दूसरा सिर्फ उलझन बढ़ाता है।
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मैसेज का रिप्लाई देर से आया..., किसी ने आपकी तारीफ नहीं की... इन छोटी-छोटी बातों पर अगर आपका दिमाग तुरंत नकारात्मक निष्कर्ष निकालने लगे, तो थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है। ज़्यादा चिंता करने वाले लोग अक्सर बिना पूरी जानकारी के सबसे बुरा परिणाम मान लेते हैं। जबकि हकीकत कई बार उससे बिल्कुल अलग होती है। हर बात का मतलब वैसा नहीं होता, जैसा हमारा दिमाग सोच लेता है।
क्या आपने कभी महसूस किया है कि किसी छोटी-सी चीज़ को खरीदने या कोई सामान्य फैसला लेने में भी काफी समय निकल जाता है? कई बार लोग हर विकल्प के बारे में इतनी देर तक सोचते रहते हैं कि आखिर में फैसला लेना ही मुश्किल हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मन बार-बार हर संभावना का विश्लेषण करता रहता है। इसी वजह से कई लोग सही समय पर निर्णय नहीं ले पाते और बाद में यही सोचते रहते हैं कि शायद कोई दूसरा विकल्प बेहतर होता। मनोविज्ञान में इसे Analysis Paralysis कहा जाता है, यानी जरूरत से ज्यादा सोचने की वजह से निर्णय लेने में रुकावट आना।
पूरा दिन किसी तरह निकल जाता है, लेकिन जैसे ही आप सोने जाते हैं, दिमाग की स्पीड अचानक बढ़ जाती है। पुरानी बातें, अधूरे काम, आने वाले कल की चिंता और दिनभर की घटनाएं एक-एक करके याद आने लगती हैं। शरीर आराम करना चाहता है, लेकिन दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। अगर ऐसा अक्सर होता है और इसकी वजह से आपकी नींद प्रभावित होती है, तो यह भी ज़्यादा सोचने का संकेत हो सकता है।
कई लोग किसी भी नई स्थिति में सबसे पहले उसके बुरे परिणामों के बारे में सोचने लगते हैं। किसी काम की शुरुआत करने से पहले ही मन में डर, चिंता घर कर लेती है। अगर आपका दिमाग हर परिस्थिति में पहले जोखिम की कल्पना करता है, तो यह सिर्फ सामान्य चिंता नहीं, बल्कि ज़्यादा सोचने का हिस्सा भी हो सकता है। भविष्य की तैयारी करना अच्छी बात है, लेकिन हर समय बुरे नतीजों के बारे में सोचते रहना आपके आत्मविश्वास और मानसिक शांति को प्रभावित कर सकता है।
कुछ लोग महीनों या सालों पहले हुई छोटी-छोटी बातों को भी बार-बार याद करते रहते हैं। उन्हें यह लगता है कि अगर उस समय उन्होंने कुछ अलग किया होता, तो शायद आज सब कुछ बेहतर होता। अगर बीती हुई बातें आज भी आपको परेशान करती हैं और आप उनसे आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो यह भी बहुत ज़्यादा सोचने का एक संकेत हो सकता है। आप हमेशा याद रखिए, कि अतीत को कभी बदला नहीं जा सकता। लेकिन उससे सीख लेकर आगे बढ़ना हमेशा आपके हाथ में होता है।
आपको कभी ऐसा महसूस हुआ है कि आपने पूरे दिन कोई भारी काम नहीं किया, फिर भी शाम तक ऐसा लगता है कि जैसे आपकी सारी ऊर्जा खत्म हो गई हो? लगातार सोचते रहना भी दिमाग को उतना ही थका सकता है, जितना शारीरिक मेहनत शरीर को थकाती है। इसी वजह से ज़्यादा चिंता करने वाले लोगों को कई बार चिड़चिड़ापन, ध्यान लगाने में परेशानी और बिना वजह मानसिक थकान महसूस होने लगती है।
कुछ लोग हर बातचीत के बाद अपनी कही हुई बातों को बार-बार याद करते हैं। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने कुछ गलत कहा होगा या सामने वाला उनके बारे में अच्छा नहीं सोच रहा होगा। अगर आप भी दूसरों की राय को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचते हैं और छोटी-छोटी बातों का बार-बार विश्लेषण करते रहते हैं, तो यह भी बहुत ज़्यादा सोचने का एक संकेत हो सकता है। सच तो यह है कि ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त होते हैं कि वे दूसरों के बारे में उतना नहीं सोचते, जितना हम मान लेते हैं।
सोचना बुरी बात नहीं है। बल्कि सही समय पर सही फैसले लेने के लिए सोचना जरूरी भी है। लेकिन जब यही आदत आपकी नींद, खुशी, रिश्तों और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे, तो उस पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। अगर आपको इनमें से कई संकेत अपने अंदर दिखाई देते हैं, तो खुद को दोष देने की बजाय धीरे-धीरे अपनी आदतों में बदलाव लाने की कोशिश करें। रोज थोड़ा टहलें, अपने विचार डायरी में लिखें, स्क्रीन टाइम कम करें, मेडिटेशन करें या किसी भरोसेमंद इंसान से खुलकर बात करें।
