2025 से शुरू हुई नई ‘हाईटेक’ पीढ़ी, क्या है यह ‘Gen Beta’, जानिए आप कौन सी जनरेशन के हैं…
2025 में नई पीढ़ी का आगाज हो गया है, और नई पीढ़ी को एक नया नाम दिया गया है, जिसे जनरेशन बीटा कहा गया है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के साथ बड़े होंगे। आइए जानें जनरेशन बीटा क्या होता है।
- Written By: आंचल लोखंडे
दुनिया का दौर बदलने के साथ-साथ पीढ़ियां भी बदल रही हैं। क्या आप जानते हैं नए साल 2025 के साथ एक नई पीढ़ी की शुरुआत हो गई है, जिसे 'जनरेशन बीटा' कहा जाएगा। इस पीढ़ी में 2025 से 2039 के बीच जन्मे बच्चे शामिल होंगे, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के साथ बड़े होंगे। जहां जनरेशन बीटा सपनों और टेक्नोलॉजी के नए आयाम गढ़ेगी, वहीं पिछली पीढ़ियों ने तंगी, लाचारी, और युद्ध का सामना किया। कौन सी थीं वो पीढ़ियां जिन्होंने सबसे कठिन दौर देखा? आइए, एक नज़र इस पर डालते हैं। (सभी फोटो सोर्स: सोशल मीडीया)
ग्रेटेस्ट जनरेशन को संघर्ष, बलिदान और नई दुनिया की नींव रखने वाली पीढ़ी के तौर पर जाना जाता है। यह नाम उन लोगों को दिया गया जो 1901 से 1927 के बीच पैदा हुए। इस पीढ़ी को “ग्रेटेस्ट” कहने के पीछे उनके जीवन में आए संघर्ष और बलिदान का इतिहास छिपा है। ऐसे दौर में जन्मे, जब दुनिया में उथल-पुथल मची थी। इसी दौर में पहला विश्व युद्ध छिड़ा। युद्ध के दौरान ये या तो बच्चे थे, या अपनी युवावस्था की दहलीज पर। उन्होंने युद्ध की विभीषिका को करीब से देखा। बेरोजगारी, भूख, और आर्थिक अस्थिरता इनके जीवन का हिस्सा बन गई। यही नहीं, सेकंड वर्ल्ड वॉर का भी हिस्सा रहे।
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1951 में टाइम मैगज़ीन में छपे एक लेख “द यंगर जनरेशन” में पहली बार इस पीढ़ी को ‘साइलेंट जनरेशन’ कहा गया। यह नाम उनके अनुभवों और व्यवहार से उपजा, क्योंकि इस दौर में पैदा हुए लोगों ने अपनी तकलीफों और संघर्षों को चुपचाप सहन किया। 1929 में शुरू हुई आर्थिक मंदी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। इस पीढ़ी ने भी बचपन में गरीबी, भूख, और अभाव को बेहद करीब से महसूस किया। लाखों परिवारों को अपनी आजीविका और घर गंवाने पड़े। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के समय में ये पीढ़ी किशोर या युवा थी। यह वह समय था जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित थी।
1946 से 1964 के बीच जन्मे लोगों को बेबी बूमर जनरेशन कहा जाता है। उन्हें इस कैटेगरी में इसलिए रखा गया क्योंकि इस दौरान जीवन बदलने वाली कई टेक्नोलॉजी पेश की गईं। इस पीढ़ी के लोगों ने अपना पूरा जीवन यह सीखने में बिताया कि टेक्नोलॉजिकल युग में कैसे कार्य किया जाए। उन्होंने अपने समय में मॉडर्न डेवलपमेंट भी देखा। और इस दौरान लोकसंख्या भी बढ़ी थी।
जनरेशन एक्स 1965 से 1980 के बीच जन्मे लोगों को कहा जाता है। जनरेशन एक्स भी बेबी बूमर्स की तरह टेक्नोलॉजी के लिए नए थे। हालांकि, इस जनरेशन को मॉडर्न जमाने की शुरुआत माना जाता है। हिप्पी कल्चर, सिनेमा, आर्ट और म्यूजिक को एक नया रॉक एंड रोल देने वाली जनरेशन इसी पीढ़ी को माना जाता है। आज के समय में ये जनरेशन बुजुर्ग और युवा लोगों के बीच एक पुल का काम करती है।
1981 से 1996 के बीच जन्मे लोगों को मिलेनियल्स कहा जाता है। आपने अक्सर सोशल मीडिया पर मिलेनियल्स से जुड़े कई पोस्ट देखे होंगे। यह वह जनरेशन है जिसने अपने जीवन में सबसे अधिक बदलाव देखे और सीखे हैं। इस जनरेशन के लोग न सिर्फ पुराने जमाने के लोगों की तरह अपना जीवन जीते हैं, बल्कि बदलती टेक्नोलॉजी के साथ वे खुद को बदल भी रहे हैं।
1997 से 2012 तक जन्मे लोगों को जनरेशन Z और शॉर्ट में Gen Z कहा जाता है। इस जनरेशन के लोगों की शुरुआत सोशल मीडिया से हुई। इस दौर में जन्मे लोगों ने ट्रोल्स-साइबर बुलिंग जैसी चीजों का भी सामना किया है। इस जनरेशन के आने के बाद ही ट्रेंडिंग, वाइब्स और ऐसे ही कई स्लैंग फेमस हुए हैं।
2013 से 2025 तक जन्म लेने वाले लोगों को जनरेशन अल्फा कहा जाता है। इस जनरेशन में पैदा हुए बच्चे बहुत तेज दिमाग और मल्टीटास्किंग के साथ अपनी जिंदगी जी रहे हैं। इस पीढ़ी के बच्चे इंटरनेट, सेल फोन, टैबलेट और सोशल मीडिया के साथ बड़े हो रहे हैं। इस जनरेशन को पूरी दुनिया के सबसे यंग और 21वीं सदी की असली जनरेशन माना जाता है।
अब 2025 से शुरू हो रही नई पीढ़ी, जिसमें 2025 से 2039 तक के बच्चे शामिल होंगे। यह पीढ़ी पूरी तरह से हाइपर-कनेक्टेड, डिजिटल और तकनीकी रूप से उन्नत दुनिया में पलेगी, जहां एआई, ऑटोमेशन और स्मार्ट टेक्नोलॉजी का प्रभाव गहरा होगा। McCrindle का ऐसा मानना है कि जनरेशन बीटा एक ऐसी दुनिया में कदम रखेंगे, जहां डिजिटल जुड़ाव और आत्म-अभिव्यक्ति यानी self-expression के बीच बेहतर संतुलन होगा। नए इनोवेशन के साथ कनेक्टिविटी और डिजिटल संवाद एक सामान्य बात होगी। उनकी शिक्षा, सामाजिक संबंध और अन्य कई चीजें डिजिटल होंगी।
आपको सवाल पड़ा होगा कि जनरेशन के नाम रखने की शुरुआत कब से हुई तो कई रिपोर्ट्स के मुताबिक 20वीं सदी में ही पीढ़ियों के नाम रखने की शुरुआत कर दी गई थी। इसे तय करने में सोशियोलॉजिस्ट और डेमोग्राफर्स की मदद लगती है। ये लोग जनगणना के आंकड़े और बर्थ रेट को देखते हैं। इसके अलावा समाज में हो रहे बदलावों को समझने की कोशिश करते हैं। उस समय हो रही घटनाओं पर खास ध्यान दिया जाता है, कि इनका जनता पर क्या असर पड़ा? यही नहीं, इसके साथ ही कई और बातों का भी ध्यान रखा जाता है। जैसे आर्थिक हालात, तकनीकी विकास और राजनीति। तब जाकर सोच-विचार से ये नाम तय किए जाते हैं।
