मणिपुर संकट से कैसे निपटेगी मोदी सरकार… राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां क्या-क्या?
Modi Government : मणिपुर में भाजपा के नेतृत्व में नई सरकार गठन के बाद भी हिंसा भड़क चुकी है। राज्य में जातीय हिंसा दो साल से अधिक समय से रह-रह कर फैल रही है। इसमें सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है।
- Written By: रंजन कुमार
मणिपुर के नए सीएम युमनाम खेमचंद सिंह। इमेज-सोशल मीडिया
Manipur New Government : मणिपुर के जख्म आज भी हरे हैं। लगभग तीन वर्षों से हिंसा की आग में झुलस रहे राज्य में शांति बहाली की हर कोशिश नाकाम साबित हुई है। केंद्र की मोदी सरकार ने बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए 4 फरवरी 2026 को राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से बहाल किया। भाजपा के युमनाम खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन सत्ता परिवर्तन के 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि राज्य फिर हिंसा की चपेट में आ गया।
शांति स्थापित करने के उद्देश्य से खेमचंद सरकार ने अपनी कैबिनेट में कुकी-जो और नागा समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक समावेशी चेहरा देने की कोशिश की। चार कुकी-जो विधायकों के समर्थन से बनी इस सरकार का मकसद जातीय खाई को पाटना था। मगर, 5 फरवरी को चुराचांदपुर के तुइबोंग में भड़के हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने साफ कर दिया कि जमीन पर हालात बेहद संवेदनशील हैं। प्रदर्शनकारियों ने नई सरकार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसके बाद प्रशासन को भारी सुरक्षा बल तैनात करना पड़ा।
भाजपा के लिए डबल इंजन की साख दांव पर
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि मणिपुर संकट अब केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुका है। इसके प्रभाव को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य की दोनों सीटें गंवानी पड़ीं, जिसे जनता की नाराजगी का सीधा संदेश माना गया। कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष प्रधानमंत्री की मणिपुर से दूरी और दिल्ली से निर्देशित सरकार चलाने के आरोपों को लेकर हमलावर है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के भीतर भी असंतोष के स्वर हैं। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच संतुलन बिठाना आग पर चलने जैसा हो गया है।
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संकट की जड़ें और समाधान की राह
3 मई 2023 को शुरू हुई यह हिंसा मुख्य रूप से मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच अविश्वास की उपज है। मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग और कुकी समुदाय की अपनी पहचान व जमीन खोने के डर ने इस विवाद को जन्म दिया।
आगे का रास्ता क्या है?
सिर्फ सैन्य तैनाती या सरकार बदलने से मणिपुर की समस्या हल होती नहीं दिख रही। जानकारों का मानना है कि दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों को एक मेज पर लाकर सीधा संवाद जरूरी है। पुनर्वास और राहत के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की आवश्यकता है। भाजपा सरकार को राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर विपक्ष को भी विश्वास में लेना होगा। मणिपुर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे सत्ता के समीकरणों से ज्यादा मरहम की जरूरत है। क्या नई सरकार इस विश्वास को बहाल कर पाएगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
