बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं मिली फेलोशिप! शोधार्थियों ने वर्धा विश्वविद्यालय पर लगाए गंभीर आरोप
Wardha Hindi University Controversy: वर्धा विश्वविद्यालय के दो शोधार्थियों ने प्रशासन पर मानसिक प्रताड़ना और फेलोशिप रोकने का आरोप लगाया है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है।
- Written By: आकाश मसने
वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय व पीड़ित शोधार्थी (सोर्स: सोशल मीडिया)
Wardha Hindi University Fellowship Controversy: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह कोई शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रशासन और शोधार्थियों के बीच छिड़ा गहरा विवाद है। बाॅम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ द्वारा दो शोधार्थियों राजेश कुमार यादव और रामचंद्र के निष्कासन व निलंबन को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद, छात्रों का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर परेशान किया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
स्त्री अध्ययन विभाग (सत्र 2021) के इन दोनों शोधार्थियों को 27 जनवरी 2024 को विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। प्रशासन का तर्क था कि इन्होंने सोशल मीडिया पर संस्थान की छवि धूमिल की है। हालांकि, शोधार्थियों का कहना है कि यह कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि वे विश्वविद्यालय में हो रही अवैध शिक्षक नियुक्तियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे।
शाेधार्थी राजेश यादव ने बताया कि वर्ष 2022 से मैंने और मेरे साथियों ने संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से विश्वविद्यालय में पारदर्शिता की मांग शुरू की। हमने लिखित शिकायतें दीं, ज्ञापन दिए, धरने दिए। इसके बदले हमें प्रशासन का प्रतिशोध मिला। 2023 में मुझे निलंबित किया गया और एक नवनियुक्त शिक्षक को आगे करके मिथ्या आरोप लगाकर एफआईआर करवाई गई।
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिया ये आदेश
मामला जब बॉम्बे उच्च न्यायालय पहुंचा, तो कोर्ट ने विश्वविद्यालय की कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। कोर्ट की टिप्पणी के बाद दोनों को बहाल तो कर दिया गया, लेकिन असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ। शोधार्थियों का आरोप है कि बहाली के बाद भी उनकी बकाया फेलोशिप रोक ली गई है, जिससे वे गहरे आर्थिक संकट में हैं। राजेश यादव ने बताया कि उनकी और रामचंद्र की 36 महीनों में से 24 महीने की फेलोशिप रिलीज कर दी गई है, लेकिन 12 महीने की अभी भी बाकी है।
कुलसचिव और नियुक्तियों पर उठाए सवाल
इस विवाद की आंच अब वर्तमान कार्यवाहक कुलसचिव कादर नवाज खान तक पहुंच गई है। राजेश ने आरोप लगाया कि 2019-2023 के बीच जब प्रो. रजनीश शुक्ल कुलपति थे, तब कादर नवाज के कार्यकाल में 18 अवैधानिक शिक्षक नियुक्तियां हुईं। उन पर फर्जी प्रमाणपत्र, एसएफएस पदों के अवैधानिक रूपांतरण, बीसीआई (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) प्रकरण में लापरवाही तथा विश्वविद्यालय निधि से निजी आवास पर खर्च करने के गंभीर आरोप हैं। हालांकि आरोपों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि 2025 में उन्होंने स्वयं स्थायी कुलसचिव पद के लिए आवेदन भी किया।
राष्ट्रपति के दौरे से पहले बढ़ा तनाव
बता दें कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में 16 अप्रैल 2026 को दीक्षांत समारोह प्रस्तावित है, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। ऐसे समय में शोधार्थियों द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार और ‘संस्थागत जातीय पक्षपात’ के आरोप प्रशासन की साख पर बट्टा लगा रहे हैं।
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क्या है शोधार्थियों की मांग?
- बकाया फेलोशिप तत्काल जारी की जाए।
- 27 जनवरी 2024 की कार्रवाई में शामिल अधिकारियों और शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
- 2019-2023 की शिक्षक नियुक्तियों की स्वतंत्र जांच (CBI या सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में) कराई जाए।
- वर्तमान कार्यवाहक कुलसचिव कादर नवाज खान के सन 2019 से 2023 के कार्यकाल के दौरान हुई कई नियुक्तियों पर सवाल उठे हैं। ऐसे में उन्हें पद से हटाकर उनकी भूमिका की जांच की जाए।
- प्रो. अवधेश कुमार की अध्यक्षता वाली जांच समिति को रद्द किया जाए, क्योंकि इसमें पूर्वाग्रह का आरोप है और SC/ST/OBC प्रतिनिधि शामिल नहीं हैं।
- राजेश कुमार यादव के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर रद्द की जाएं।
