‘वंदे मातरम के विरोध पर मरने की बद्दुआ’, अरशद मदनी के बयान पर भड़के जगतगुरु परमहंस की विवादित टिप्पणी
Arshad Madani Statement: वंदे मातरम को अनिवार्य करने पर मौलाना मदनी और परमहंस आचार्य के बीच छिड़ी जुबानी जंग। मदनी ने बताया धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला, आचार्य ने दिया विवादित बयान।
- Written By: अनिल सिंह
Jagatguru Paramhans Acharya On Arshad Madani (डिजाइन फोटो)
Jagatguru Paramhans Acharya: केंद्र सरकार द्वारा सरकारी कार्यक्रमों और शिक्षण संस्थानों में ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य बनाने के निर्णय पर देश में नई राजनीतिक और धार्मिक बहस छिड़ गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी द्वारा इस फैसले का विरोध किए जाने के बाद, अयोध्या के जगतगुरु परमहंस आचार्य ने उन पर बेहद तीखा और विवादित पलटवार किया है। परमहंस आचार्य ने कहा कि जो लोग ‘वंदे मातरम’ बोलने से इनकार करते हैं, उनका इस धरती पर रहना ही व्यर्थ है और उनका जल्द मर जाना देशहित में होगा। इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तनाव पैदा कर दिया है, जिससे राष्ट्रवाद और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच की खाई और गहरी होती दिख रही है।
परमहंस आचार्य ने केंद्र सरकार के इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री को आशीर्वाद दिया और कहा कि सरकार ने 140 करोड़ भारतीयों के सम्मान को वापस दिलाया है। दूसरी ओर, मुस्लिम संगठनों ने इसे संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है। अरशद मदनी के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ की कुछ पंक्तियां इस्लामी मान्यताओं के विपरीत हैं, जिसके कारण मुस्लिम समुदाय को इसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
मदनी का तर्क: ‘वंदे मातरम’ और इस्लामी मान्यताओं का टकराव
मौलाना अरशद मदनी ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है, जबकि ‘वंदे मातरम’ में मातृभूमि की वंदना ईश्वर के रूप में की गई है। मदनी ने तर्क दिया कि गीत के सभी छह अंतरों को अनिवार्य करना पक्षपाती फैसला है और यह सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों के खिलाफ है जो किसी को भी राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य करने से रोकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि देशभक्ति के नाम पर सांप्रदायिक एजेंडा थोपा जा रहा है, जिससे देश की लोकतांत्रिक एकता और शांति को खतरा हो सकता है।
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सरकार के नए दिशा-निर्देश और गायन की अवधि
केंद्र सरकार द्वारा जारी हालिया दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब सभी सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान (जन गण मन) दोनों का गायन अनिवार्य होगा। नए प्रोटोकॉल के मुताबिक, पहले ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरे गाए जाएंगे, जिसकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड तय की गई है, और उसके तुरंत बाद राष्ट्रगान गाया जाएगा। सरकार का मानना है कि यह कदम राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाने और नई पीढ़ी को देश की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए आवश्यक है।
जगतगुरु परमहंस की विवादित ‘बद्दुआ’ पर छिड़ी रार
जगतगुरु परमहंस आचार्य के बयान ने विवाद को और हवा दे दी है। उन्होंने मदनी के विरोध को राष्ट्रद्रोह के समान बताते हुए कहा कि जो मातृभूमि की वंदना नहीं कर सकता, उसे भारत में रहने का अधिकार नहीं है। उनके द्वारा “मरने की बद्दुआ” दिए जाने के बाद विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज ने इसकी निंदा की है। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक ओर राष्ट्रगीत का सम्मान जरूरी है, वहीं दूसरी ओर ऐसे उग्र बयान समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं। फिलहाल प्रशासन स्थिति पर नजर रख रहा है ताकि इस धार्मिक विवाद के कारण कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो।
