बदलते दौर में भी अडिग: ठाणे का ऐतिहासिक हिंदी स्कूल, जहाँ प्रवेशोत्सव पर बंटीं मुफ्त किताबें
Thane Hindi Medium School: ठाणे के 60 साल पुराने गौतम हिन्दी विद्यालय में नवीन शैक्षणिक सत्र पर प्रवेशोत्सव मनाया गया। मुख्य अतिथि पवन कदम ने छात्रों को मुफ्त किताबें बांटीं।
- Written By: सूर्यप्रकाश मिश्र | Edited By: गोरक्ष पोफली
किताबें भेंट करते हुए (सोर्स: फाइल फोटो)
Thane Gautam Hindi Vidyalaya 60 Years: शिक्षा व्यवस्था में तेजी से बदलाव हुआ है। दशकों पुराने हिंदी, मराठी विद्यालय बंद हो रहे हैं और अंग्रेजी माध्यम के कान्वेंट स्कूल खुल रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हिंदी विद्यालय हैं जो कई दशकों से विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दे रहे हैं। ठाणे के सबसे पुराने हिंदी विद्यालय में से एक गौतम हिन्दी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय लगभग 60 साल का हो गया है। सोमवार को नवीन शैक्षणिक सत्र पर विद्यार्थियों के स्वागत एवं प्रवेशोत्सव कार्यक्रम में विद्यार्थियों को मुफ्त पाठय़पुस्तक का वितरण किया गया। इस अवसर पर मनपा में शिवसेना के गुट नेता एवं नगरसेवक पवन कदम मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
1967 से शुरू हुआ सफर और सफलता के मूल मंत्र
विद्यालय के सचिव आशिष कमल गौतम ने बताया कि यह हिंदी विद्यालय उनके दादा ने 1967 के पहले शुरू किया था। पवन कदम ने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि नियमित अध्ययन, अनुशासन तथा उच्च लक्ष्य निर्धारित कर जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
साथ ही उन्होंने विद्यालय के शैक्षणिक कार्यों की सराहना करते हुए विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। संस्था सचिव आशीष गौतम ने भी अतिथियों का स्वागत करते हुए विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम में स्कूल के मुख्याध्यापक, शिक्षकगण, पालक एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
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गौरवशाली परंपरा और मातृभाषा में शिक्षा की प्रासंगिकता
इस अवसर पर वक्ताओं ने विद्यालय की लंबी परंपरा और मातृभाषा में शिक्षा के महत्व की सराहना की। जहां कई भाषाई माध्यम के स्कूल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, वहीं 1967 से चली आ रही इस संस्था ने विद्यार्थियों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से प्रोत्साहित कर शिक्षा की लौ को जलाए रखा है। कार्यक्रम में उपस्थित बड़ी संख्या में पालकों और विद्यार्थियों का उत्साह यह दर्शाता है कि अनुशासन और उच्च लक्ष्यों के साथ अपनी जड़ों से जुड़ी शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
