नवी मुंबई भाजपा में अंदरूनी टकराव, नाईक-म्हात्रे मतभेद से चुनावी रणनीति हुई पेचीदा
Thane News: भाजपा में गणेश नाईक और मंदा म्हात्रे के बीच बढ़ते मतभेदों और सामंजस्य की कमी के कारण आगामी महानगर पालिका चुनाव में पार्टी की रणनीति प्रभावित हो रही है, जिससे कार्यकर्ताओं में असमंजस है।
- Written By: सोनाली चावरे
गणेश नाइक, मंदा म्हात्रे (pic credit; social media)
Navi Mumbai Municipal Election: आगामी नवी मुंबई मनपा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर सत्ता संघर्ष और मतभेद आम जनता के सामने साफ दिखाई देने लगे हैं। ऐरोली से विधायक और वन मंत्री गणेश नाईक और बेलापुर से विधायक मंदा म्हात्रे के बीच आपसी सामंजस्य की कमी ने पार्टी कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा कर दिया है कि वे किसके नेतृत्व में काम करें।
नाईक लगातार ‘एकला चलो’ की नीति पर जोर दे रहे हैं और अकेले दम पर चुनावी रणनीति बनाने में लगे हैं। वहीं, महायुति के शीर्ष नेताओं की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे घटक दलों के लोग उलझन में हैं।
नवी मुंबई मनपा में शामिल 14 नए गांवों को लेकर भी मतभेद जारी हैं। नाईक समर्थक इन गांवों के समावेश का विरोध कर रहे हैं, जबकि मंदा म्हात्रे का समर्थन है। महापौर पद के चयन को लेकर विवाद पहले से ही शुरू हो गया है। यदि भाजपा अकेले दम पर सत्ता प्राप्त करती है, तो महापौर का चयन नाईक करेंगे, जबकि म्हात्रे सर्वसम्मति की नीति पर जोर दे रही हैं।
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यह वर्चस्व की लड़ाई नई नहीं है। विधानसभा चुनाव में भी इसी संघर्ष के चलते मंदा को टिकट दिया गया था, जबकि नाईक का प्रभाव कम करने की रणनीति सामने आई।
भाजपा के भीतर इस अंदरूनी कलह का सीधे फायदा शिवसेना को मिल सकता है। यदि नाईक और म्हात्रे समर्थक अलग-अलग प्रचार करेंगे, तो मत विभाजन के कारण पार्टी को नुकसान होगा। कार्यकारिणी गठन में भी विवाद हुआ। नाईक समर्थक अपेक्षा कर रहे थे कि उनके करीबी को जिला अध्यक्ष बनाया जाएगा, लेकिन डॉ. राजेश पाटिल को यह जिम्मेदारी मिली।
नाईक समर्थकों को अहम पदों से दूर रखा गया और कुछ कम अनुभव वाले कार्यकर्ताओं को प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिससे नाराजगी बढ़ी। महिला कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात कर बदलाव की मांग की।
यह स्थिति साफ कर रही है कि नवी मुंबई मनपा चुनाव में भाजपा के लिए सत्ता पर काबिज होना आसान नहीं होगा। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य की कमी सीधे चुनावी रणनीति और वोटिंग पर असर डाल सकती है। अब यह देखना बाकी है कि आगामी चुनाव में अंदरूनी कलह किस हद तक पार्टी की जीत पर प्रभाव डालती है।
