करोड़ों की सरकारी ज़मीन बिल्डर को ! हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार
Government Land Case: मीरा-भायंदर में 254 एकड़ सरकारी जमीन को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने इसे सरकारी जमीन बताया।
- Written By: सूर्यप्रकाश मिश्र | Edited By: आंचल लोखंडे
Supreme Court Appeal (सोर्सः फाइल फोटो- सोशल मीडिया)
Mira Bhayandar Land Dispute: मीरा-भायंदर में राज्य सरकार की करोड़ों रुपये की जमीन दो बिल्डरों को देने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जाने का निर्णय लिया है। राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि इस फैसले को स्पेशल लीव पिटीशन के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जाएगा।
मीरा भायंदर में करीब 254.88 एकड़ ज़मीन को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 30 अप्रैल, 2026 को यह ज़मीन दो बिल्डरों, डीस्टेट इन्वेस्टमेंट और मीरा रियल एस्टेट डेवलपर्स को देने का अपना फैसला सुनाया था। राजस्व मंत्री ने कहा कि वह ज़मीन राज्य सरकार की है,और यह फैसला अनएक्सपेक्टेड था, इसलिए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लीव पिटीशन फाइल करने का निर्देश दिया है, ताकि इसके खिलाफ सरकार का दावा मजबूती से पेश किया जा सके।
क्या है मामला ?
मीरा-भायंदर के भायंदर इलाके में राज्य सरकार के मालिकाना हक वाली 254.88 एकड़ ज़मीन के रेवेन्यू रिकॉर्ड में 1948 से सरकार से बिना कोई इजाज़त लिए बदलाव किया गया था। इसमें फेरफार कर ‘एस्टेट इन्वेस्टमेंट कंपनी’ और बाद में ‘मीरा साल्ट वर्क्स’ का नाम गैर-कानूनी तरीके से जोड़ा गया। 1958 में इस ज़मीन का इस्तेमाल नमक के खेत के तौर पर होने की वजह से इसमें केंद्र सरकार के नमक विभाग का नाम जोड़ दिया गया। उसके बाद ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। फिर, सुप्रीम कोर्ट ने ठाणे डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को अपील करने को कहा।
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मीरा-भायंदर में 254 एकड़ ज़मीन शासन की
2002 में डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने इस ज़मीन पर मीरा साल्ट कंपनी का दावा खारिज करते हुए पूरी ज़मीन सरकार को ट्रांसफर करने का आदेश दिया था। हालांकि, 2019 में इन कंपनियों और केंद्र सरकार के साल्ट कमिश्नर ने इसके खिलाफ सबसे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की। 30 अप्रैल को कोर्ट ने केंद्र सरकार के साल्ट कमिश्नर की अपील खारिज कर दी और फैसला सुनाया कि यह ज़मीन मीरा साल्ट वर्क्स की है। दरअसल, हाई कोर्ट के फैसले में पहली अपील मेंटेनेबिलिटी के मुद्दे पर थी।
हालांकि, हाई कोर्ट के फैसले से यह संभावना है कि निजी डेवलपर्स ‘मीरा रियल एस्टेट डेवलपर्स’ का नाम सरकारी ज़मीन पर बना रहेगा। चूंकि यह मामला आम लोगों के अधिकारों और सरकार के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए रेवेन्यू मिनिस्टर चंद्रशेखर बावनकुले ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का फैसला किया है।
लैंड रेवेन्यू कोड 1966 क्या है?
रेवेन्यू मिनिस्टर चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि यह ज़मीन सरकार की है। हम रेवेन्यू रिकॉर्ड बदलकर सरकारी ज़मीन हड़पने की कोशिशों को नाकाम करेंगे। इस मामले में हम सुप्रीम कोर्ट में पूरी ताकत से सरकार का पक्ष रखेंगे और यह ज़मीन सरकार के कब्जे में रखेंगे। बावनकुले ने महाराष्ट्र लैंड रेवेन्यू कोड 1966 के सेक्शन 29 (3)(a) के प्रोविज़न का हवाला देते हुए दावा किया कि यह ज़मीन सरकार की है।
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राजस्व मंत्री बावनकुले का कड़ा रुख
उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र लैंड रेवेन्यू कोड के अनुसार, कोड के शुरू होने से पहले लागू किसी भी कानून के तहत ज़मीन रखने का अधिकार कम से कम पचास साल के समय के लिए हासिल किया गया है, जिसे हमेशा के लिए या तय समय पर पेमेंट करके रिन्यू करने का ऑप्शन है। ऐसे लीज़ के तहत, जिन लोगों को इस कोड के लागू होने से पहले बिना किसी अधिकार के ज़मीन के अधिकार दिए गए हैं, उनके अधिकार, ज़िम्मेदारियां और देनदारियां, 1966 के सेक्शन 29 (3)(a) के प्रोविज़न के अनुसार, इस कोड के तहत वर्ग 2 के तहत ही माने जाएंगे। उनको शासन की जमीन का मालिकाना अधिकार नहीं मिल सकता।
