MBMC चुनाव में ‘महायुति’ दरकिनार! मीरा-भाईंदर में BJP vs शिवसेना की सीधी जंग, किसका पलड़ा भारी?
MBMC Elections में वर्षों बाद भाजपा और शिवसेना बिना गठबंधन के आमने-सामने हैं। विधायक नरेंद्र मेहता ने 70+ सीटें जीतने का दावा किया है, तो प्रताप सरनाईक ने भी 50 पार का संकल्प लेकर पलटवार किया।
- Written By: प्रिया जैस
एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Mira Bhayander Municipal Corporation Election 2026: आगामी मीरा-भाईंदर महानगरपालिका (MBMC) चुनाव ने राज्य की राजनीति में नया उबाल ला दिया है। वर्षों तक कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना इस बार बिना किसी गठबंधन (युति) के एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोंक रही हैं। नामांकन के अंतिम दिन दोनों दलों के बीच जो शक्ति प्रदर्शन और जुबानी जंग देखने को मिली, उसने चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
भाजपा का जातीय कार्ड और 70 पार का नारा
भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करते हुए जीत का बड़ा भरोसा जताया। मेहता ने घोषणा की कि भाजपा ने कुल 95 सीटों में से 87 पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा की इस सूची में सोशल इंजीनियरिंग का विशेष ध्यान रखा गया है। इसमें महाराष्ट्रीयन (24), उत्तर भारतीय (14), राजस्थानी (14), गुजराती (12) और आगरी (15) समाज सहित ईसाई, पंजाबी और दक्षिण भारतीय समुदायों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है।
मेहता ने विश्वास जताते हुए कहा, “इस बार भाजपा अकेले दम पर 70 से ज्यादा सीटें जीतकर आएगी और मीरा-भाईंदर का अगला महापौर भाजपा का ही होगा।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी का गठबंधन आरपीआई (आठवले) और पीआरपी के साथ बना रहेगा।
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शिवसेना का ‘भारतीय’ कार्ड और जोरदार पलटवार
भाजपा के दावों के कुछ ही देर बाद शिवसेना की ओर से परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने मोर्चा संभाला। सरनाईक ने भाजपा के जातीय समीकरणों पर तंज कसते हुए कहा कि शिवसेना ने किसी जाति या धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि ’81 भारतीय उम्मीदवार’ मैदान में उतारे हैं। उन्होंने साफ किया कि शिवसेना 81 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और पार्टी का लक्ष्य 50 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करना है।
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बदलते समीकरण से बदलेंगे नेताओं के राजनीतिक भविष्य
मीरा-भाईंदर में भाजपा और शिवसेना का अलग-अलग चुनाव लड़ना न केवल स्थानीय समीकरणों को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भविष्य की राज्य स्तरीय राजनीति के लिए भी एक संकेत है। दोनों ही दलों ने नामांकन के आखिरी दिन जिस तरह समर्थकों की भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन किया, उससे साफ है कि इस बार मुकाबला कांटे का होने वाला है। अब क्षेत्र की जनता को तय करना है कि वे भाजपा के ‘विकास और समावेशी दावों’ को चुनते हैं या शिवसेना के ‘मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व’ को।
