18 साल पुराना रिश्वतकांड ढहा अदालत में! सबूतों के अभाव में ‘पॉइंट्स मैन’ बरी
Thane news: ठाणे की विशेष अदालत ने 18 साल पुराने रिश्वत मामले में रेलवे के पॉइंट्स मैन को बरी कर दिया। सबूतों की कमी और मुख्य आरोपी-शिकायतकर्ता की मौत के बाद आरोप साबित नहीं हो सके।
- Written By: सोनाली चावरे
सबूतों के अभाव में ‘पॉइंट्स मैन’ बरी (pic credit; social media)
Thane Crime News: 18 साल पुराने रिश्वतखोरी के मामले का अंत आखिरकार पूर्व रेलवे कर्मचारी के लिए राहत लेकर आया। ठाणे की एक विशेष अदालत ने अभियोजन पक्ष की नाकामी और मुख्य गवाहों के निधन के चलते रेलवे के पूर्व ‘पॉइंट्स मैन’ शिवाजी श्रीपत मशाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत के न्यायाधीश डी.एस. देशमुख ने 2 सितंबर को अपना आदेश सुनाते हुए कहा कि इस मामले में आरोप सिद्ध करने योग्य कोई ठोस सबूत नहीं है। आदेश की प्रति शुक्रवार को सार्वजनिक की गई।
यह मामला साल 2007 का है, जब कल्याण स्टेशन के तत्कालीन स्टेशन मास्टर ओमप्रकाश तिपन्ना निन्ने पर आरोप लगा था कि उन्होंने एक बूट पॉलिश ठेकेदार से 1000 रुपये मासिक रिश्वत मांगी थी। शिकायत पर सीबीआई ने जाल बिछाया और 2 मार्च 2007 को निन्ने की ओर से कथित तौर पर रिश्वत लेते समय एक व्यक्ति को रंगेहाथ पकड़ने का दावा किया गया था।
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मामले में ट्विस्ट तब आया जब उस दिन स्टेशन मास्टर का नियमित चपरासी अनुपस्थित था और पॉइंट्स मैन शिवाजी मशाल को अस्थायी तौर पर वहां लगाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि उसी दौरान रिश्वत की रकम मशाल को दी गई। लेकिन अदालत ने कहा कि इस आरोप को साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है।
सुनवाई के दौरान न सिर्फ शिकायतकर्ता की मौत हो गई बल्कि मुख्य आरोपी निन्ने का भी निधन हो चुका है। ऐसे में न तो गवाह मौजूद रहे और न ही लिखित प्रमाण। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सीबीआई की प्राथमिकी और शिकायत दोनों में मशाल का नाम बतौर रिश्वत लेने वाले व्यक्ति के तौर पर दर्ज नहीं है। ऐसे हालात में दोष सिद्ध करना असंभव है।
न्यायाधीश देशमुख ने अपने आदेश में कहा कि केवल संदेह या परिस्थितिजन्य बातों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष ने आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए, इसलिए मशाल को बरी किया जाता है।
इस फैसले के साथ ही 18 साल पुराना मामला आखिरकार बंद हो गया। यह आदेश न सिर्फ मशाल के लिए राहत भरा साबित हुआ बल्कि यह भी उजागर करता है कि लंबी अदालती प्रक्रिया और कमजोर सबूतों की वजह से कई मामलों में न्याय पाने की राह और भी मुश्किल हो जाती है।
