Satara ZP Election Controversy (फोटो क्रेडिट-X)
Satara ZP Election: महाराष्ट्र के सतारा जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव के दौरान हुई हाई-वोल्टेज ड्रामेबाजी अब कानूनी लड़ाई में तब्दील हो गई है। सतारा कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए जांच अधिकारी को ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी किया है। अदालत की टिप्पणियों से साफ है कि यदि पुलिस की भूमिका पक्षपाती पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक मामला दर्ज होना लगभग तय है।
इस घटनाक्रम ने जिले की राजनीति में भूचाल ला दिया है, क्योंकि इसमें राज्य के एक कैबिनेट मंत्री और निर्वाचित सदस्यों के साथ बदसलूकी के गंभीर आरोप लगे हैं।
चुनाव के दिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दो प्रमुख सदस्यों, अनिल देसाई और संदीप मांडवे को मतदान केंद्र के गेट से ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। आरोप है कि उन्हें जानबूझकर मतदान करने से रोका गया ताकि चुनावी समीकरणों को बदला जा सके। जमानत पर रिहा होने के बाद, इन सदस्यों ने खुलासा किया कि सतारा कोर्ट ने जांच अधिकारी अरुण देवकर को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना है कि सदस्यों की पिटाई की गई थी, जो मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सीधा उल्लंघन है।
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अनिल देसाई और संदीप मांडवे ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह पूरी कार्रवाई पहले से नियोजित थी। आमतौर पर मीडिया को मतदान केंद्र तक जाने की अनुमति होती है, लेकिन इस बार पुलिस ने मीडिया को गेट पर ही रोक दिया ताकि झड़पों और धक्कामुक्की की रिकॉर्डिंग न हो सके। सदस्यों ने मांग की है कि 4 अप्रैल को होने वाले आगामी स्पीकर चुनाव में पारदर्शिता के लिए मीडिया को प्रवेश दिया जाए और पिछली घटना के CCTV फुटेज सार्वजनिक किए जाएं। उनका दावा है कि पुलिस ने जिला परिषद सदस्य बापू शिंदे का बयान तक दर्ज नहीं किया, जो पुलिस की निरंकुशता को दर्शाता है।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब कैबिनेट मंत्री शंभूराज देसाई और नेता मकरंद पाटिल भी इस विवाद की चपेट में आ गए। प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित सदस्यों के अनुसार, मकरंद पाटिल को 10-15 पुलिसकर्मियों ने घेरा बनाकर रोक लिया था। इसी बीच हुई धक्का-मुक्की में मंत्री शंभूराज देसाई को भी चोटें आईं। पीड़ित सदस्यों ने स्पष्ट किया है कि वे इस मामले में जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपेंगे और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए कानूनी रास्ता अपनाएंगे।